तन की प्यास पानी से बुझती है और मन(जीवन) की प्यास अस्तित्वसहज वस्तुओं(वास्तविकताओं) में तदाकार होने पर ही बुझती है।
तदाकार होने की स्थिति केवल अध्ययन से आता है।
तदाकार से आशय है जैसे चार विषयों के साथ तदाकार हो जाना। पाँच संवेदनाओं के साथ तदाकार हो जाना। सुविधा-संग्रह के साथ तदाकार हो जाना। किंतु इस तरह की हविस या मनोगत भाव से तदाकार होने से मानव फंस जाता है। अब यहाँ समाधान(समझदारी/ज्ञान) के साथ तदाकार होने का प्रस्ताव है।
तदाकार होने के लिए हमारे पास कल्पनाशीलता नामक वस्तु है। आपमें कल्पनाशीलता है या नहीं उसका शोध करो। कल्पनाशीलता में तदाकार होने का गुण है।
तदाकार तक पहूंचना ही अध्ययन की मूल चेष्टा है।
शब्द से अर्थ की और ध्यान देने से अर्थ के स्वरुप में अस्तित्व में जो वस्तु है उसके साथ तदाकार होना बनता ही है।
तदाकार होने की स्थिति में जब हम पहूंचते है तो हमको स्पष्ट होता है : वस्तु, वस्तु का प्रयोजन और वस्तु के साथ हमारा संबंध। यह हर वस्तु के साथ होना है। इसमें कोई भी कडी छूटा तो वह केवल शब्द ही सुना है।
भाषा(शब्द), अर्थ और सच्चाई इन तीनों को एकसूत्रता में लाने की कोशिश करो, बात बन जाएगी।
हमको निष्कर्ष पर पहुंचना है कि नहीं पहले इसको तय किया जाए। व्यवस्था चाहिए तो निष्कर्ष पर पहूंचना आवश्यक है।
समाधान कोई शर्त नहीं है। व्यवस्था कोई शर्त नहीं है। सुख कोई शर्त नहीं है। अभय कोई शर्त नहीं है। सह-अस्तित्व कोई शर्त नहीं है। ये सब शर्त विहीन है।
अपनी शर्त लगाने से कोई बात स्पष्ट नहीं होता। हम हमारे तरीके से समझेंगे यह भी एक शर्त है। शर्त लगाते है तो रुक जाते है। वस्तु जैसा है, वैसा समझने की जिज्ञासा करने से वस्तु स्पष्ट होता है।
जीवचेतना को हम पकडे रहे और हम समझदार हो जाएँ, हमको ज्ञान हो जाएँ यह हो नही सकता। मानवचेतना में जीवचेतना विलय होता है।
मुझे समाधि-संयम पूर्वक अनुभव हुआ है। अध्ययनविधि में समाधि का विकल्पात्मक मार्ग दिये है। सीधे सीधे संयम काल में मुझे जो अध्ययन हुआ, वह आपको अध्ययन करा रहे है। यह बात आपको समझ में आता है तो अध्ययन के प्रति आपका गंभीर होना बन जाता है।
ए नागराज जी.