” सम्पूर्ण सम्बन्धों में दया का प्रवाह होता है। मनुष्य, मनुष्य के साथ, सम्बन्धों को जब पहचानता है तब सेवा, अर्पण-समर्पण करने की उमंग अपने आप उमड़ती है। शांतिपूर्ण मानसिकता के धरातल पर ही ऐसा उद्गम होना पाया जाता है। यह केवल व्यक्ति में ही नहीं, परिवार समुदाय तक भी ऐसे कार्य-कलापों को देखा गया है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रत्येक मनुष्य शान्ति कामी और गामी है। गामी होने के लिए किसी परिवार, शिक्षा, राज्य व धर्म संस्थाओं में अपने को अर्पित करता है। “
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- संदर्भ: मानवसंचेतनावादी मनोविज्ञान, अध्याय:5
- अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
- प्रणेता – श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी