“इन्द्रिय सन्निकर्ष में ही ‘अनुभव होता है’ ऐसा मानना और मनवाना, इसको लोकव्यापीकरण करने का सभी उपाय तैयार करना, साथ ही लाभोन्माद, कामोन्माद और भोगोन्मादी मानसिकता को कार्यशील, प्रगतिशील, विकासशील और अत्याधुनिक मानना और मनाना अथ से इति तक भ्रम है।
जबकि जीवन्त शरीर में ही इन्द्रिय सन्निकर्ष होना देखा गया है। जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखता है। सत्य भासने के लिये शरीर और जीवन का सह-अस्तित्व आवश्यक है। इसी क्रम में जीवन, जागृति और जागृति पूर्णता को प्रमाणित करता है। जागृति को प्रमाणित करने की इच्छा प्रत्येक मानव में समाहित रहता ही है। इसे सार्थक और लोकव्यापीकरण करने के लिये परंपरा का जागृत होना अनिवार्य है। इसी विधि से अर्थात् जागृतिपूर्ण परंपरा विधि से ही जीवन में अविभाज्य वर्तमान मध्यस्थ क्रियारत ‘आत्मा’ ही अस्तित्व में अनुभव करता है, करने योग्य है।”
(इन्द्रिय सन्निकर्ष -> इन्द्रियों से इन्द्रियों या वस्तुओं का योग।)
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- संदर्भ: अनुभवात्मक अध्यात्मवाद
- अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
- प्रणेता – श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी