1) क्रिया के प्रकार क्या है ?
प्रकृति क्रिया स्वरूप है। क्रिया का मूल स्वरूप परमाणु है।
भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया – ये तीन प्रकार की क्रिया होती है। सारी प्रकृति की यथास्थितियों में इन तीनो का जोड़ जुगाड़ है। इन सभी के मूल में परमाणु के प्रकार हैं। इसमें से भौतिक और रासायनिक क्रिया एक से दूसरे में आवर्तनशील है, जो जड़ क्रिया है। जीवन चैतन्य क्रिया है।
2)क्रिया कैसे (विधि )घटती है ?
सत्ता में संपृक्तता क्रिया का आधार या कारण है। ऊर्जा सम्पन्नता, बल सम्पन्नता, पूर्णता की दिशा, गति (परिवर्तन, स्थानांतरण, विकास, ह्रास) का कारण सत्ता में संपृक्तता है। इकाइयों की परस्परता से सम-विषम दबाव प्रभाव हैं। सत्ता मध्यस्थ है – जो सम विषम से अप्रभावित रहता है। परमाणु में मध्यस्थ क्रिया है – जो सम विषम का नियंत्रण करती है। परमाणु का हर प्रकार एक निश्चित आचरण को प्रस्तुत करता है। यही परमाणु जुड़ के या बिखर के जड़ प्रकृति के भिन्न भिन्न विन्यासों को प्रकाशित करते हैं।
क्रिया निरंतर है। रुकती ही नहीं है। चाहे जड़ हो या चैतन्य हो। क्रिया करने के लिए ऊर्जा नित्य प्राप्त रहती है।
क्रियाओं का संयोजन योग विधि से होता है। पदार्थावस्था, प्राणावस्था में यह संयोजन एक प्रकार से है। जीवावस्था में जीवन शरीर वंश के अनुसार क्रिया करता है। ज्ञानावस्था में संस्कार के अनुसार काम करता है।
3)क्रिया के परिणाम का प्रभाव कर्ता के अलावा अन्य पर भी क्यो होता है ?
कोई भी क्रिया या इकाई अकेले में नहीं है, दूसरी इकाइयों के सहअस्तित्व में है। इसलिए परस्पर प्रभाव होना स्वाभाविक है। परस्पर प्रभाव से ही आगे विकास/प्रकटन संभव है।
4)क्या “कार्य -कारण” संबध के सिवाय क्रियाएँ घटती रहती है ?
नहीं। कारण और कार्य अविभाज्य है। कारण क्रिया की धारणा या धर्म है। फल परिणाम निश्चित है।