शास्त्र को सर्वोपरि प्रमाण मानने तक पहुंचा है – मानव को प्रमाण नहीं माना। यही मुख्य बात है. सह-अस्तित्व वादी विधि से शिक्षा व्यवस्था में जीने के अर्थ में है। स्थिरता और निश्चयता के आधार पर है. हम स्थिरता-अनिश्चयता चाहते हैं या अस्थिरता-अनिश्चयता? – इसका भी अपने में परिशीलन करिये. हम यदि स्थिरता-निश्चयता चाहते हैं तो क्या उसे हम पाए हैं या नहीं – इसका भी अपने में परिशीलन करिये। यदि स्थिरता-निश्चयता को पा गए हैं तो उसमे प्रमाणित हैं या नहीं – इसको सोचिये। इस तरह हम सोचते हैं तो अभी तक की शिक्षा की समीक्षा होती है, उसका मूल्यांकन होता है, और हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि – अभी तक की शिक्षा निरर्थक है, अपराधिक है, अनिश्चित है, अस्थिर है। इसमें कोई शंका हो, कोई जिज्ञासा हो, कोई प्रश्न हो तो उसको आप सभी मुझसे पूछ सकते है।
आपका कोई प्रश्न नहीं है – उसका मतलब मैं यह नहीं मानता कि आपको यह बात स्वीकार हो गयी है। आप इस बात में पारंगत हो गए – ऐसा मैं नहीं मानता हूँ। स्वीकार होने पर प्रमाण ही होता है। आप इस बात से सहमत हुए हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।
- श्रद्धेय बाबा श्री ए नागराज जी के जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन २०१० में उदबोधन पर आधारित
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