संबंध
“संबंध” की परिभाषा है – पूर्णता के अर्थ में अनुबंध(प्रतिज्ञा)। पूर्णता का मतलब है, – क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता.
क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता व्यवस्था के रुप में ही प्रमाणित होता है. इस तरह हर सम्बन्ध की पहचान व्यवस्था के अर्थ में होती है.
व्यवस्था में खून के सम्बन्ध भी हैं, और अन्य संबंध भी.
संबंध को बनाना नहीं है, सिर्फ पहचानना है. सभी मनुष्य नियतिविधि से मनुष्य और मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ संबंध से जूडे हुए ही है.
मानव के सभी सम्बन्ध शरीर-यात्रा पर्यंत होते हैं.
मानव-संबंध की बात करें तो संबंध एक ‘मैं'(जीवन) का दूसरे ‘मैं'(जीवन) के साथ होता है..
(इसको एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य के साथ संबंध के रुप में भी देखा जा सकते है, लेकिन चूंकि मनुष्य में संबंध को पहचानने वाला और उसका निर्वाह करने वाला ‘जीवन’ ही होता है, शरीर नहीं. इस अर्थ में हम कह सकते है की संबंध मूल में दो ‘जीवन’ के बीच होता है. )
संबंध का आधार एक ‘मैं’ का दूसरे ‘मैं’ के प्रति मूल्य/भाव/अपेक्षा है..
ये मूल्य/भाव/अपेक्षाएँ निश्चित(नौ/9) है, उनको पहचाना जा सकता है और पहचान के निर्वाह किया जा सकता है..
नौ भाव/अपेक्षाएँ 👇🏼
1) विश्वास
2) सम्मान
3) स्नेह
4) ममता
5) वात्सल्य
6) गौरव
7) श्रद्धा
8) कृतज्ञता
9) प्रेम
उपरोक्त मूल्य/भाव/अपेक्षाओं का निर्वाह करने से उभयसुख-उभयतृप्ति/Mutual happiness-Mutual fulfillment की घटना घटती है जिसको “न्याय” कहते है.
मानव-संबंधों को दर्शन में कूल 7(सात) प्रकार में बांटा गया है, और सभी में न्याय की अपेक्षा रहती है.
न्याय के लिए सबसे पहली बात है, दुसरे व्यक्ति को इन सात संबंधों में से किसी एक संबंध में place कर पाना. यदि वह कर पाते हैं तो वहां न्याय हो सकता है.
(वैसे न्याय केवल दो समझदार व्यक्तिओं के बीच ही संभव है.)
सात सम्बन्ध हैं –
(१) माता-पिता और पुत्र-पुत्री के बीच
(२) गुरु-शिष्य
(३) भाई-बहन
(४) मित्र-मित्र
(५) पति-पत्नी
(६) साथी-सहयोगी
(७) व्यवस्था गत सम्बन्ध.
हर सम्बन्ध में निश्चित कर्त्तव्य और दायित्व होते हैं – जिसका निर्वाह होने पर, और निर्वाह हुए का मूल्यांकन होने पर, यदि दोनों पक्षों को तृप्ति होती है – तो न्याय हुआ.
मानव-संबंध का सूत्र :👇🏼
संबंधो की पहचान..
मूल्यों का निर्वाह..
मूल्यांकन..
उभयतृप्ति.
मनुष्येत्तर प्रकृति के साथ का सम्बन्ध उनके साथ नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्वक जीने के रूप में है.