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मानसिकता
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➡️ मानव परंपरा में यह विदित है कि मानव क्रियाकलाप के मूल में मानसिकता का रहना अत्यावश्यक है । मानसिकता विहीन मानव को मृतक या बेहोश घोषित किया जाता है । विकृत मानसिकता (मान्य, सामान्य मानसिकता के विपरीत) वाले मानव को पागल, असंतुलित अथवा रोगी के नाम से घोषणा की जाती है । यह सभी क्रियाकलाप वांछित, इच्छित और आवश्यकीय मानसिकता हर क्षण, हर पल, हर दिन शरीर यात्रा पर्यन्त प्रभावित होने के क्रम में ही
राज्य मानसिकता,
धर्म मानसिकता,
व्यापार मानसिकता,
अधिकार मानसिकता,
भोग मानसिकता,
सुविधा-संग्रह मानसिकता समीक्षित होता है ।
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न्याय मानसिकता,
धर्म (समाधान) मानसिकता,
नियम मानसिकता,
प्रामाणिकता पूर्ण मानसिकता,
समृद्घि मानसिकता,
सह-अस्तित्व मानसिकता,
वर्तमान में विश्वास मानसिकता,
परिवार मानसिकता,
स्वायत्त मानसिकता,
समाज मानसिकता,
व्यवस्था मानसिकता,
मानवीय शिक्षा-संस्कार मानसिकता,
स्वास्थ्य संयम मानसिकता
का मूल्यांकन किया जाना जागृत परंपरा में संभव होता है ।
अनुभवमूलक विधि से किया गया कार्य-व्यवहार विचार, अर्पण-समर्पण, सम्बंध-मूल्य-मूल्यांकन-उभय तृप्ति परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन लाभ-हानि मुक्त विनिमय, प्रामाणिकता पूर्ण प्रबोधन (समझे हुए को समझाने, किये हुए को कराने, सीखे हुए को सिखाने) से ही ये सब सकारात्मक उपलब्धियाँ मानव परंपरा में सहज-सुलभ होना पाया जाता है । यह सम्पूर्ण वैभव मानव परंपरा में अनुभवात्मक अभिव्यक्ति एवं मानसिकताएँ है.
- संदर्भ: अनुभवात्मक अध्यात्मवाद, अध्याय:2
- अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
- प्रणेता – श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी