कल्पनाशीलता के आधार पर जिज्ञासा है। जिज्ञासा ही पात्रता है। जिज्ञासा की प्राथमिकता के आधार पर ही ग्रहण होता है। जिज्ञासा की प्राथमिकता है या नहीं – इसको सटीक पहचानना अध्यापक का काम है। प्राथमिकता को स्वीकारना और उसके लिए प्रयास करना विद्यार्थी का काम है।
पाँच वर्ष की आयु तक बच्चों में अपने अभिभावकों के प्रति अपनी जिज्ञासा पूरी होने के प्रति पूरा विश्वास रहता है। लेकिन उनकी जिज्ञासा अभिभावकों के न पहचान पाने से और उनके द्वारा उसे पूरा न कर पाने की स्थिति में बच्चों का विश्वास घटता जाता है। धीरे-धीरे वह घटते-घटते शून्य हो जाता है। एक आयु के बाद बच्चे दूर हो जाते हैं।
“सुख की निरंतरता” मानव का प्रयोजन है। संवेदनाओं में सुख भासता है, पर सुख की निरंतरता बन नहीं पाती। “सत्य में सुख की निरंतरता है” – इस परिकल्पना के साथ जिज्ञासा है। निरंतर सुख संवेदनाओं में नहीं होता है, समाधान से ही निरंतर सुख होता है। यह अनुसंधान पूर्वक मैंने पता लगाया, अब समाधान के लिए सभी का रास्ता बना दिया।
- श्रद्धेय बाबा श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २०११, अमरकंटक)