देखने से, धर्म की सउर देखने से पता लगता है अपराधियों के लिए ही ये सब बना हुआ है..धर्म तंत्र और राजतंत्र|
क्योंकि अपराधियों को तारने वाला भी एक गुण तो मानव परंपरा में बना तो है!..तारने के लिए जो कुछ भी युक्ति रचाया… राजतंत्र अपने ढंग से रचाया .. धर्म तंत्र अपने ढंग से रचाया..ये तो है तो मूलत: कहीं कहीं गलती की ही बात है ये ..
गलत ही रहेगा आदमी यही मान के सारी रचनाएँ हुई वो सर्वथा गलत हो गया|
हर मनुष्य समझदार होना चाहता है परंपरा उसको दे नहीं पाया| सीधा सीधा बात है|
तो हर मनुष्य ईमानदार होना चाहता है वो इमानदारी का रास्ता दिखा नहीं पाया|
हर व्यक्ति जिम्मेवार होना चाहता है जिम्मेदारी का प्रयोजन हम लोगों को, परंपरा को दे नहीं पाये|
पहले से ही हम ऐसा मिसाल दे नहीं पाये परंपरा में इसलिए हम पिछड़ गए और हमारा जो कुछ भी अरमान था..
शुभ की..तो पहले भी कई सारे लोग ये कामना की है सबका शुभ हो, सबके लिए कल्याण हो, सबके लिए मंगल हो, सब जो है ना तर जाये..इस प्रकार की बातों को तो बहुत सारे लोग दोहराए हैं इसमें हमको कोई शंका नहीं है..ये दोहराने मात्र से हमको क्या उसका रास्ता मिल गया?
उसका रास्ता नहीं मिला|
जिस किताबों में लिखा रहता है सबका शुभ हो उसी में लिखा रहता है यह सारे संसार झूठा है और असली माँ बाप केवल ईश्वर ही है उन्हीं के शरण में जाना चाहिए यही किताब में लिखा रहता है|
तो किसका सबका कल्याण होगा?
असली माँ बाप के पास जाने के बाद जो गया हुआ है उसका अस्तित्व रहना नहीं है| अब किसका कल्याण होना है?
जब वह स्वयं में असली माँ बाप कल्याण स्वरुप ही है फिर कल्याण के लिए ये सब सारे को पैदा किया? यह पुन: बात जड़ में आ जाते हैं हम|
ये सब बात से कोई प्रयोजन निकलता नहीं है|
प्रयोजन इतना ही है समझदार होने पर ही आदमी का प्रयोजन निकलता है| समझदार ना होने से प्रयोजन नहीं निकलता|
ये अंतिम रूप में एक निष्कर्ष रूप में आता है|
तो सभी संबंधों में प्रयोजन निहित रहता है|
क्या प्रयोजन?
ये जो पहले कही गई चार बात है…चार लक्ष्य है…
समाधान, समृद्धि, अभय, सह अस्तित्व रुपी लक्ष्य है| इसको सफल बनाने के अर्थ में ही प्रयोजन रहता है|
सारा प्रयोजन, सारे संबंधों का प्रयोजन वो इसी से जुड़ा रहता है| ये इसमें जुड़ने के पश्चात परंपरा बन जाती है|
समझदारी यदि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को पहुँच पाता है स्वाभाविक है उसके आगे पीढ़ी को भी जायेगी उसके आगे पीढ़ी को भी जायेगी|
“आदरणीय श्री ए नागराज जी”
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