तरण-तारण की सार्थकता
इस सौभाग्यशाली मुहूर्त में आप हम सब यहाँ (अमरकंटक में) उपस्थित हुए हैं। इस स्थान को युगों से हम मानव सर्वोपरि पवित्र-स्थल मान कर चले हैं। “यहाँ सभी प्रकार के लोप दोष से मनुष्य दूर हो जाता है” – ऐसा पुराणों, भागवत आदि ग्रंथों में लिखा है। यहाँ मैंने लगभग ५५ वर्ष तक निवास किया। यह जो (पुराणों आदि में) कही गयी बात है – वह पूरा सही है, लेकिन उसमें एक शर्त है। उस शर्त की ओर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है – वह है “पवित्रता”।
(1) पवित्रता की ओर हमें “ध्यान” देने की ज़रूरत है।
(2) पवित्रता की “आवश्यकता” महसूस करने की ज़रूरत है।
(3) पवित्रता को “प्रयोजनशील” बनाने की ज़रूरत है
(4) पवित्रता को “प्रमाणित करने” की ज़रूरत है।
ऐसी चार स्थितियां बनी हैं। इसमें से चौथी स्थिति में मैं अपने को मानते हुए इस शरीर को जीवित रखता हुआ अनुभव करता हूँ। इस जगह को “तीर्थ-स्थली” कहा जाता है। तीर्थ-स्थली के बारे में कहा गया है – “स्वयं तरता, पराम तारयेत”। इसी को “तरण-तारण” शब्द दिया गया है।
“तरण-तारण” की सार्थकता क्या है?
जितने भी कायिक, वाचिक, मानसिक गलतियाँ हैं उनसे मुक्ति दिलाना ही “तारण” है। उन गलतियों से मुक्त हो कर स्वयं को प्रमाणित करना ही “तरण” है।
क्या समझ में आने से “तरण-तारण” होगा? – इसको खोजने गए तो विगत में उसे “रहस्य” में ले गए। ज्ञान से ही “तरण-तारण” होगा – यह करीब-करीब सभी समुदायों में स्वीकृत है, ऐसा मेरा सोचना है। विगत में जिसको “ज्ञान” बताया था, उसको “जीने” के बारे में सोचा तो वह रहस्य में चला गया। इन दो बातों को मैं यहाँ आने से पहले सुन-समझ के आया था। यहाँ आने के बाद मेरे साथ जो घटनाएं हुई – साधना के बाद समाधि, समाधि के बाद संयम, संयम के बाद जो कुछ मुखरण या प्रस्तुति हुई, उससे “सुख” और “दुःख” के स्वरूप का पता चल गया। कैसे हम सब सुखी होते हैं, कैसे हम सब दुखी होते हैं – यह पता चल गया।
सारे गलतियों से मुक्ति “सुख” है। सारे गलतियों को सही मान करके चलना “दुःख” है। इतना ही बात है। समस्या के समीकरण में दुःख है, समाधान के समीकरण में सुख है। इसको मैं समझा, और समझने के बाद जिया। जीने के बाद ऐसा लगा – “यह बात ठीक है।” ऐसा लगने के बाद कुछ लोगों के बीच में मैंने स्वयं का परीक्षण करना शुरू किया।
मैंने स्वयं को संसार द्वारा “परीक्षण” कराने के लिए प्रस्तुत किया है, कोई “उपदेश” देने के लिए प्रस्तुत नहीं किया है। आप मुझको परीक्षण कर सकते हैं, मेरी कही हुई बातों को समझ कर परीक्षण कर सकते हैं। मेरा परीक्षण, और मेरे द्वारा कहे गए तथ्यों का परीक्षण आप कर सकते हैं। इन दोनों बातों को लेकर मैं आज चल रहा हूँ।
इस तरह चलने पर एक बहुत अच्छी सूझ आयी – मनुष्य किस विधि से “सुखी” हो जाता है? और किस विधि से दुखी हो जाता है? उसकी थोड़ी सी झलक आपके सामने प्रस्तुत करना चाह रहे हैं।
- अनुभव-शिविर (जनवरी २००६ ), अमरकंटक में श्रद्धेय बाबा श्री नागराज जी के उद्बोधन से
साभार- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)