स्वतन्त्रता
“◘ प्रत्येक मानव स्वतंत्र, स्वतंत्रित एवं स्वतंत्रतापूर्ण होना चाहता है।
स्वतंत्र-पूर्णता का प्रत्यक्ष रूप ही है ज्ञान विवेक सहित विज्ञान का प्रयोग, जिसमें ही नियमपूर्ण उत्पादन, न्यायपूर्ण व्यवहार, धर्मपूर्ण विचार एवं सत्यमय अनुभूति है। यही स्वतंत्रता सहज प्रमाण है, जो जागृति पर आधारित है।
स्वतंत्रताधिकार मानवीता पूर्ण मानव देव तथा दिव्य मानवीयता की कोटि में सफल होता है।
◘ प्रत्येक मानव स्वतंत्रता के प्रति आशुक, कल्पनाशील तथा इच्छुक है।
न्याय, धर्म, सत्य पूर्ण विधि से ‘‘स्वंय में से, के, लिए तंत्रित एवं नियन्त्रित जीवन-प्रतिष्ठा ही स्वतंत्रता है।’’
मानव में न्याय की चरितार्थता की क्षमता ही स्वतंत्रता है, यही सामाजिकता का प्राण व त्राण है। अमानवीयतावश (पशु मानव एवं राक्षस मानव) स्वतंत्र एवं संयत नहीं है।
मानवीयतापूर्ण मानव संयमता से, में, के लिए स्वतंत्रता का प्रमाण हैऔर ऐषणा त्रय सहित उपकार करता है।
देव मानव स्वतंत्रता का प्रमाण है एवं लोकेषणा सहित उपकार करता है।
अतिमानवीयतापूर्ण दिव्य मानव पूर्ण स्वतंत्र है तथा ऐषणा मुक्त विधि से उपकार करते हैं। स्वतंत्रता के प्रमाण में संवेदनशीलताएं संज्ञानशीलतापूर्वक नियन्त्रित रहना पायी जाती है।
आत्मा के संकेतानुरूप बुद्घि, बुद्घि के संकेतानुरूप चित्त, चित्त के संकेतानुरूप वृत्ति, वृत्ति के संकेतानुरूप मन है, जो क्रम से अनुभव, बोध, इच्छा, विचार एवं आशा है। यही स्वतंत्र जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। इसके विपरीत में लोकानुरूप, आशानुरूप एवं कल्पनानुरूप इच्छाएं परतंत्रता का प्रत्यक्ष रूप हैं, जबकि परतंत्रता मानव सहज वांछित घटना एवं उपलब्धि नहीं है।
मध्यस्थ क्रिया पूर्ण जीवन ही स्वतंत्रता है।
मध्यस्थ क्रिया का अस्तित्व है, इसलिए स्वतंत्रता की संभावना है।
◘ अमानवीयता में असामाजिकता, मानवीयता में सामाजिकता एवं अतिमानवीयता में स्वतंत्रता, स्वराज्य प्रमाणित होता है, जो प्रसिद्घ है।
सामाजिकता से सम्पन्न हुए बिना मानव का अतिमानवीयता को पाना संभव नहीं है, क्योंकि जागृति एक सघन व्यवस्था एवं क्रम है। विचार सीमा में ही मानव स्वतंत्रता का अनुभव करता है, क्योंकि जागृत मानव का मूल मूत्र्त रूप आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अनुभूति और प्रमाण ही है।
◘ मानवीयता से परिपूर्ण होना ही स्वतंत्रता का प्रधान लक्षण है। स्वयं से तंत्रित होना न्याय, समाधान प्रमाणित होना ही स्वतंत्रता है। यही जीवन-चरितार्थता का लक्षण है।
मानव के स्वत्व में क्षमता, योग्यता एवं पात्रता है। उनके स्वाधीन (स्वबौद्घिकता के अधीन) में जिन वस्तु, स्थान व जीवों को पाया जाता है, उनकी अनिवार्यता मानव की उपयोग क्षमता में, से, के लिए ही है। क्षमता ही वहन, योग्यता ही प्रकटन एवं पात्रता ही ग्रहण क्रियाएं हैं, जो प्रत्येक मानव में प्रत्यक्ष हैं। साथ ही यही मानव का स्पष्ट रूप एवं अधिकार भी हैं। क्षमता, योग्यता एवं पात्रता ही मानवों का इकाईत्व, सीमा, संवेग, प्रवृत्ति, प्रतिभा, व्यक्तित्व, वहन, निर्वाह, निरूपण, निर्धारण, निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण एवं संयोजन है। यही उत्पादन, व्यवहार एवं अनुभव प्रमाण है।
वहनपूर्वक स्थापित मूल्यों का निर्वाह, शिष्टतापूर्वक शिष्ट मूल्यों का आचरण एवं व्यवहार, आचरण सहित भौतिक मूल्यों (उत्पादन मूल्यों) का समर्पण-अर्पण-उपयोगी सिद्घ हुआ है। यही स्वतंत्रता का मूल रूप है।
स्वत्व निर्वाह से, स्वतंत्रता प्रयोजन से, अधिकार उपलब्धि से प्रमाणित है।
मानव का अधिकार भौतिकता (उत्पादन व व्यवस्था) में, अधिकार एवं स्वतंत्रता बौद्घिकता (आचरण एवं स्वतंत्रता) में, अधिकार स्वतंत्रता एवं स्वत्व अध्यात्म (अनुभव) में चरितार्थ हुआ है। यही व्यवहारात्मक जनवाद, समाधानात्मक भौतिकवाद, अनुभवात्मक अध्यात्मवाद है, जो धर्म नीति एवं राज्य-नीति को स्पष्ट करता है।
◘ वर्ग वाद में अखंडता नहीं है। जब तक मानव जीवन में अखंडता नहीं है तब तक भय से मुक्ति नहीं है। जब तक भय से मुक्ति नहीं है तब तक स्वतंत्रता नहीं है, जब तक स्वतंत्रता नहीं है तब तक अपव्ययता का अभाव नहीं है।
◘ मानव में पायी जाने वाली स्वतंत्रता की तृषा का तृप्त हो जाना ही मानव-जीवन में दृष्टा पद एवं जागृति है। मानव जीवन भी जागृति क्रम है। स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष रूप ही सतर्कता एवं सजगता है जो मानवीयतापूर्ण समाज, सामाजिकता, आचरण, संस्कृति, विधि, व्यवस्था एवं शिक्षा है। ये सभी परस्पर पूरक तथ्य हैं।
◘ अन्तर्विरोध विहीनता ही मध्यस्थता है। यही संतुलन, समाधान, प्रत्यावर्तन, सतर्कता, सजगता एवं स्वतंत्रता है।
◘ ‘‘विधि विहित जीवन यापनाधिकार ही प्रत्येक मानव का मौलिक अधिकार है।’’ मौलिकता से परिपूर्णता ही मौलिक अधिकार है। मानव में मानवीयता पूर्ण क्षमता ही मौलिकता है। मानव के मौलिक अधिकार का प्रयोग व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार, परिवार के सहयोग एवं सहकार, समाज के प्रबोधन एवं प्रोत्साहन, राष्ट्र के संरक्षण एवं संवर्धन तथा अंतर्राष्ट्र में उसके अनुकूल स्थिति परिस्थिति के लिए किया गया कार्यक्रम है। संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था की एकात्मता ही अंतर्राष्ट्र में अनुकूल स्थिति-परिस्थिति है। मानवीयता को संरक्षण एवं संवर्धनदायी विधि व्यवस्था उसके व्यवहारान्वयन योग्य व्यवस्था पद्घति एवं नीति ही अखण्ड सामाजिकता का संरक्षण एवं संवर्धनकारी तत्व है। मानवीयतापूर्ण संस्कृति सभ्यता का प्रचार, प्रदर्शन, प्रकाशन, गोष्ठी, संगोष्ठी, आख्यान, स्पष्टीकरण एवं समीक्षात्मक कार्यकलाप ही समाज का प्रबोधन एवं प्रोत्साहन सर्वस्व है। परिवार में चारित्रिक एवं नैतिक कार्यक्रम में द्दढ़ता, विश्वास एवं अवगाहन क्षमता ही व्यक्ति के आचरण एवं व्यवहार में सहयोगिता एवं सहकारिता है, जो स्पष्ट है। यही मानव जीवन चरितार्थता का स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष रूप है। यही जीवन चरितार्थता भी है। यही मानव के मौलिक अधिकार तथा उसकी उपयोगिता, उपादेयता एवं उपलब्धि है। मौलिक अधिकार का अनुष्ठान ही स्वतंत्रता का लक्षण है। इसका पालन, अनुसरण एवं अनुशीलन ही स्वतंत्रता का द्योतक है।
◘ प्रेमानुभूति ही स्वतंत्रता को स्पष्ट करती है। प्रेमानुभूति के बिना स्वतंत्रता पूर्वक मानवीयता का निर्वाह करना संभव नहीं है। स्वतंत्रता जीवन का लक्ष्य है। ‘‘मानवीयता से परिपूर्ण होना ही स्वतंत्रता की प्रतीति, प्रेमानुभूति का भास एवं उसकी संभावना का आभास होता है।’
◘ स्वतंत्रतापूर्वक सामाजिकता का आचरण ही सामाजिकता की परिपक्वता है। स्वतंत्रता ही प्रेमानुभूति का प्रधान लक्षण है।
◘ आत्मानुशासित जीवन स्वतंत्रतापूर्वक मानवता को अभिव्यक्त करता है। साथ ही देव मानव पद में प्रतिष्ठित होता है। देव मानव में निवृत्ति परिचय होता है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर ही मध्यस्थ जीवन स्थापित होता है। यह स्वतंत्रता का प्रधान कारण है। मानव स्वतंत्रता के लिए अनादिकाल से प्रतीक्षारत है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर स्वभावत: मानव स्वतंत्र होता है। यही देव मानव पद है। देवमानव मानव के लिए मार्गदर्शक होता है। प्रत्यावर्तन के अनन्तर ही आत्मा से बुद्घि, बुद्घि से चित्त, चित्त से वृत्ति एवं वृत्ति से मन अनुशासित होता है। मन से मेधस, मेधस से इंद्रिय व्यापार संपन्न होता है। इस पद्घति से आत्मानुशासित जीवन प्रकट होता है।
‘‘ब्रह्मानंद ही अभ्यास की परमोपलब्धि है अथवा अभ्यास का चरमोत्कर्ष है।’’ ब्रह्मानंद ही सत्तामयता में अनुभूति है। यही जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति का अभीष्ट है। चैतन्य प्रकृति का अंतिम जागृति सोपान यही है। देवमानवीयता से दिव्यमानवीयता में यही संक्रमण है अथवा आचरणपूर्णता में संक्रमण है आचरणपूर्णता का प्रधान लक्षण ही ब्रह्मानंद है। ऐसे ब्रह्मानुभूति सम्पन्न व्यक्ति ही आप्तपुरूष हैं। इनमें आप्तकामना स्वभाव रूप में निष्पन्न होता है। यही मध्यस्थ जीवन की सर्वो’च स्थिति है। ऐसी इकाईयाँ संसार के लिए मार्गदर्शक, पथदर्शक एवं जीवन के रहस्योन्मूलक होता है।
💢अभ्यास दर्शन