ध्वनि के एक तरीके को हम भाषा कह रहे है। इन्द्रियों के साथ शब्द तैयार होता है। शब्द अंततोगत्वा भाषा के नाम से आया। भाषा है भासना। शब्द के अर्थ से वस्तु(वास्तविकता/Reality) का भास होना। शब्द के अर्थ से वस्तु कल्पना में आना। अपनी कल्पना में आने के बाद वह साक्षात्कार हो जाए। वह अनुभव में आ जाए। वह प्रमाणित हो जाए। प्रमाणित होना अर्थात जीने में, बोलने में, समझाने में अनुभव प्रमाणित होना।
सुनना भाषा है।
भाषा से समझना अर्थ है।
अर्थ अस्तित्व में वस्तु(वास्तविकता/Reality) है।
वस्तु(वास्तविकता/Reality) समझ में आता है तो हम अर्थ समझते है।
समझ जो है वो अनुभव है।
शब्द अनुभव नहीं है।
शब्द का अर्थ होता है।
अर्थ के मूल में अस्तित्व में वस्तु(वास्तविकता) होता है।
वस्तु को इंगित करना ही शब्द का का काम है।
उसको पहचान लेना मानव का काम है।
वस्तु(वास्तविकता) पहचान लिया = समझ में आया।
नहीं पहचाना = समझ में नहीं आया।
पहचान पूरा हो जाना = अध्ययन पूरा होना।
अध्ययन पूरा होना = सहअस्तित्व रुपी अस्तित्व में बोधसंपन्न होना।
स्त्रोत : ‘संवाद’
मध्यस्थ दर्शन