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सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग

सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग

Posted on May 30, 2023

*सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग १

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आदिकाल से, जबसे ईश्वर और ईश्वरीयता की चर्चा वांग्मय में (अर्थात लेख रूप में) अथवा मुखस्थ विधि से परम्परा के रूप में आरम्भ हुआ – तब से “सत्य” शब्द के रूप में सुनना रहा। साथ में यह भी बना रहा – ईश्वर और ईश्वरीयता मानव के समझ में समाने वाली चीज नहीं है। इसके कारण में यह बताया गया – ईश्वर और ईश्वरीयता मानव-कल्पना से बहुत “बड़ा” है। यह मानव-कल्पना में समाती नहीं है। ऐसे उदगार और ध्वनी सुनने में आता है।

इसके आगे ईश्वर और ईश्वरीयता को “ब्रह्म” शब्द से भी इंगित किया गया। “सत्य” शब्द तो रहा ही। सत्य, ज्ञान, ब्रह्म, परमात्मा – ये सब नामो से ईश्वर और ईश्वरीयता को इंगित किया गया। इसकोऔर महिमा-मंडित करने के क्रम में यह बताया गया – “ईश्वर ही अपने संकल्प से बहुत रूप में प्रकट हो गया।” इस क्रम में जो कुछ भी प्रकट है, उसको “जीव” और “जगत” नाम दिया गया।

ईश्वर अपने स्वरूप में “एक” होते हुए अनेक रूप में होने के संकल्प मात्र से जीव और जगत कैसे उत्पन्न हुआ, उसके बारे में लेखन के अनुसार – ब्रह्म से आकाश प्रकट हुआ, आकाश से वायु प्रकट हुआ, वायु से अग्नि प्रकट हुआ, अग्नि से जल प्रकट हुआ, जल से पृथ्वी प्रकट हुआ। इसे भारतीय परम्परा में “पञ्च-तत्व” नाम दिया। “जीव” कैसे पैदा हुआ? उसके उत्तर में भारतीय विचार परम्परा में “माया” के सम्बन्ध में स्वीकृतियां बनी हुई हैं। “माया” कहाँ से आ गया? – इसके सम्बन्ध में कोई मूल प्रबंध उपलब्ध नहीं हुआ। भारतीय सोच-विचार परम्परा में ब्रह्मा की परछाई माया पर पडी तब मलिन रजोगुण में हलचल पैदा हुई, जिससे असंख्य जीवों का प्रकटन हुआ। ब्रह्म अपने नज़रों में यह घटना को देखने पर जीवों के ह्रदय में स्वयं “आत्मा” के रूप में विराजमान हो गया! इस घटना को “जीव कारन्य वश” ब्रह्म स्वयं घटित किया। ऐसी स्वीकृति आलेखों में मिलती है। आगे बताया गया है – जीवों के भोग के लिए पञ्च तत्वों से शरीर निर्मित हुआ।

यहाँ कुछ और तथ्यों का भी उल्लेख करना मालूम हो रहा है। भारत के अतिरिक्त और भी देशों ने जो “बुनियादी” रूप से कुछ कहना चाहा है, उन सबके कथन में “जीव-जगत” की बात आती है। कुछ में जीव और जगत को अलग-अलग न कहते हुए, ऐसा बताया – किसी “महान” की इच्छा से यह संसार पैदा हुआ। भारतीय-विचार में सृष्टि जीव-जगत ईश्वरीय संकल्प और ईश्वर की परछाई के आधार पर निर्मित हुआ। इस प्रगटन विधि को “आगम” नाम दिया। यह जो जीव-जगत प्रगट हुआ, उसके कालान्तर में ईश्वर रुपी सत्ता में विलय होने की बात का भी उल्लेख किया गया है। इस विलय होने को नाम दिया – “निगम”। “आगम” और “निगम” के बीच में जो कुछ भी जीव-जगत भास्-मान है वह “स्वप्न-वत” है; यह सम्पूर्ण वैभव जो भासता है – वह ईश्वर की रहस्यमयी महत्ता है – ऐसा बताया। इन सब मूल बातों के आधार पर भारतीय-परम्परा में ज्ञान और उपासना कर्म-विधियों के रूप में जो भी आदेश, उपदेश, संदेश मनुष्य को संकेत के रूप में दिए गए हैं वे सभी “जीव-जगत पर भरोसा न करने की बात” में पूरा होते है। यह प्रस्तुति लोगों को तर्क-संगत भी लगती है, जिससे ऐसी स्वीकृतियां पुष्ट भी होती हैं। इन सभी आदेश, उपदेश, संदेश रुपी प्रेरणाओं और तर्क से हुई पुष्टियों के आधार पर मानव अनेक प्रकार से “आगम”, “निगम”, “माया”, “आत्मा”, “मोक्ष” और “बंधन” के सूत्रों को प्रकाशित करता रहा है। इन सब सूत्रों की सार बात यह है – “एक ही ब्रह्म जो रहस्यमय है, उन्ही के संकल्प से जीव-जगत पैदा हुआ, जो कालांतर में उसी ब्रह्म की इच्छा से उसी ब्रह्म में समा जाएगा।” “ब्रह्म में समा जाएगा” – इसको “समाधि” नाम दिया। समाधि तक पहुँचने के लिए अनेक प्रक्रियाएं वांग्मय रूप में प्रस्तुत की गयी हैं।

सार रूप में – समाधि में ही “परम-ज्ञान” संपन्न होने का आश्वासन है। ज्ञान को वाणियों से अथवा शब्दों से संप्रेषित करना सम्भव नहीं है – ऐसा बताया गया है। ज्ञान अपने स्वरूप में अव्यक्त रहना बताया गया है। यह सब विगत में बतायी गयी भाषा है। इस पर शोध और अनुसंधान करने की प्रवृत्तियां पहले से ही लोगों में रहा है। इसी के आधार पर समाधि के लिए मैंने अपने को प्रस्तुत किया।

समाधि की स्थिति में मुझे कोई ज्ञान नहीं हुआ। जबकि – शास्त्रों में, और बुजुर्गों ने मुझे यही बताया था – समाधि में अज्ञात ज्ञात होता है। शास्त्रों के अनुसार, बुजुर्गों के अनुसार – समाधि की स्थिति में देश, काल, और शरीर का ज्ञान नहीं रहता है। इतनी बात सच्चा होना मुझे समझ में आया। समाधि में जो मेरी जिज्ञासा थी कि “क्या बंधन और मोक्ष का कारण एक ही वस्तु है, या अलग-अलग वस्तु है?” – उसका उत्तर नहीं मिला।

पूरा वैदिक वांग्मय में इस बात की पुष्टि की है कि एक ही वस्तु (ब्रह्म) बंधन और मोक्ष का कारण है। ब्रह्म को सत्य, ईश्वर, ज्ञान, परमात्मा – यह सब नाम दिया गया है। यदि बंधन और मोक्ष का कारण एक ही वस्तु है तो उस वस्तु का इतना

बड़े अपराध के रूप में शुरू करने का क्या कारण है? एक ही वस्तु बंधन और मोक्ष का कारण होना मुझे स्वीकार नहीं हुआ। सामान्य-ज्ञान से भी यह पता चलता है – बंधन मोक्ष का कारण नहीं हो सकता। दूसरे, मोक्ष-महिमा बंधन का कारण नहीं हो सकती। इसमें ब्रह्म पर “दोहरेपन” का आरोप स्पष्ट होता है। किसी भी मनुष्य को दोहरा-व्यक्तित्व स्वीकार नहीं है।

अभी संसार में किसी भी सामान्य व्यक्ति से यदि हम सर्वेक्षण करें और पूछें – “आप निश्चित व्यक्तित्व से संतुष्ट होते हैं, या दोहरे व्यक्तित्व से संतुष्ट होते हैं?” इसके उत्तर में सर्वाधिक व्यक्तियों का उदगार “निश्चित व्यक्तित्व” के पक्ष में ही सुनने को मिलता है। इससे पता चलता है – तमाम गलतियों और अपराधों से भरी हुई परम्पराओं का अनुयायी होते हुए भी सामान्य-व्यक्ति उनसे उभरना चाहता है। अभी सम्पूर्ण धरती पर “सामान्य व्यक्तियों” की संख्या ज्यादा है। “विशेष व्यक्ति” कम हैं। “विशेष व्यक्ति” ही धर्म-गद्दी, राज्य-गद्दी, और व्यापार-गद्दी को संभाले हुए हैं। ये तीन गद्दियाँ सामन्य-व्यक्तियों को डुबाने के लिए तीन-भंवर बनाए पड़े हैं। पहला भंवर है – छल, कपट, दंभ, पाखण्ड। दूसरा भंवर – साम, दाम, दंड, भेद। तीसरा भंवर – द्रोह, विद्रोह, शोषण, युद्ध। “विशेष व्यक्तियों” के द्वारा इतने प्रयासों के बावजूद “सामान्य व्यक्ति” कम से कम ४९% इन भंवरों से अछूता रहा है।

सटीक जीने की इच्छा “मध्यम कोटि” के आदमी में आज भी देखने को मिलता है। मध्यम-कोटि की मानसिकता ही है – न्याय के प्रति तीव्र इच्छा रहना। मध्यम-कोटि के व्यक्तियों को ही “सामान्य व्यक्ति” माना जाता है। “उच्च कोटि” के व्यक्ति के रूप में आजकल उनको पहचाना जाता है – जिनके पास सर्वोपरि पैसा हो, जो सर्वोपरि पद में बैठे हों। इन्ही के द्वारा उपरोक्त तीन-भंवर तैयार हुए हैं। “उच्च कोटि” के लोगों के पास सटीक जीने का कोई खाका ही नहीं है।

इसके अलावा एक और तबका है, जिसकी चर्चा शेष रह गयी है – उसको परम्परा में “निम्न कोटि” कहा गया है। दूसरी भाषा में “सर्वहारा” कहा गया है। तीसरी भाषा में “निरीह” कहा गया है। चौथी भाषा में “पापी” कहा गया है। पांचवी भाषा में “अज्ञानी” कहा गया है। ऐसे लोगों के लिए राज-गद्दी की आवाज है – “अपने अधिकारों को पहचानो, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाओ!” ऐसे लोगों के लिए धर्म-गद्दी की आवाज़ है – “भगवान्, ईश्वर, गुरु, महापुरुष, देवताओं के प्रति शरणागत भाव में आस्था रखें, उद्धार हो जाओगे!” ऐसे लोगों के लिए शिक्षा-गद्दी की आवाज है – “पिछड़े रह कर कोई कल्याण नहीं है, आगे बढ़ना है। आगे बढ़ने के लिए संघर्ष ही है।” संघर्ष का मतलब है – अपराध-प्रयास, छीना-झपटी का प्रयास, सेंध-मारी, जान-मारी, लूट-मारी का प्रयास। ऐसे लोगों के लिए व्यापार-गद्दी का आवाज है – “जल्दी व्यापार में लग जाओ, लाभ से तरबतर हो जाओ!” इस प्रकार इन चार गद्दियों की आवाज संयुक्त रूप में यह इंगित करता है – “मनमानी करो, पकड़ में मत आओ! अफवाह (आरोप-प्रत्यारोप) के चक्कर में मत पड़ो!” दूसरे शब्दों में – “अपराध सब-कुछ करो, पर सोच के करो! प्रतिष्ठित रहने के लिए।

“”मानवीयता” की पहचान होने पर हम मानव-जाति को नाम दे सकते हैं – ज्ञानी, अज्ञानी, और विज्ञानी। इससे “विशेष”, “सामान्य”, और “निम्न” – ये सब भाषाएँ समाप्त हो जाते हैं। इन भाषाओँ का प्रयोग करते हुए सच्चाई और समानता को पहचानना मुश्किल है। ये तीन नाम (ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी) परंपरागत वर्ग-वादी, समुदाय-वादी, व्यक्ति-वादी मानसिकता की संतुष्टि के लिए दिया गया है। समझदारी संपन्न विधि से यदि नाम हो सकता है, तो वह है – केवल मानव। चेतना-विकास – मूल्य शिक्षा में पारंगत होने के उपरान्त ही सम्पूर्ण समुदायों के रूप में पहचान में आने वाले सभी व्यक्ति “मानव” के नाम से ही इंगित होगा। हम मानव प्रकारांतर से परेशानी में जो फंसे हैं – उनका कल्याण केवल समझदारी से है, जो सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है।

– श्रद्धेय बाबाजी श्री ए. नागराजजी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६, अमरकंटक)

साभार- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)

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