बुद्धि के साथ “विवेक” पूर्वक हम सुखी होते हैं.
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बुद्धि के साथ सुखी होने की विधि है – विवेक। अविवेक पूर्वक हम दुखी होते हैं। विवेक के बारे हमें विगत में पूर्वजों ने बताया था – “आत्मा का अमरत्व और शरीर का नश्वरत्व विवेक है”। सह-अस्तित्व वादी विधि से हम यहाँ बता रहे हैं – जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व, और व्यवहार के नियम ये तीन मिला करके विवेक है। जीवन के रूप में मैं अमर हूँ – यह समझ में आना। शरीर गर्भ में जैसा रहता है, बाहर वैसा नहीं रहता, और बड़े होने पर वैसा नहीं रहता, फ़िर एक दिन शरीर विरचित भी होता है – यह हमारे सामने घटित घटनाएं हैं। शरीर प्राण-कोशों से रचित एक रचना है। रचना का विरचना होता ही है। शरीर नश्वर है – यह समझ में आना। शरीर को विरचित होना ही है, तो इसका क्या किया जाए? सदुपयोग किया जाए। शरीर का सदुपयोग करने हेतु हम “व्यवहार के नियम” पर जाते हैं। शरीर के नश्वरत्व के प्रति हम पूरा आश्वस्त रहते हैं। जीवन के अमरत्व के प्रति हम पूरा आश्वस्त रहते हैं। व्यवहार के नियमो के प्रति हम पूरा आश्वस्त रहते हैं। बुद्धि की ताकत इन तीनो को समझने से है। विवेक पूर्वक जीने से हम “सुखी” होते हैं।
अविवेक पूर्वक सोचते हैं, तो शरीर को अमर मानना शुरू कर देते हैं। जीवन को अमर मानने की जगह शरीर को अमर मानने पर दुखी होना स्वाभाविक है। “शरीर का नश्वरत्व” को स्वीकारना नियति-सहज स्वीकृति है। नियति-सहज का मतलब – शरीर का विरचित होना एक अस्तित्व-सहज क्रियाकलाप है। अस्तित्व सहज जो भी क्रियाकलाप है, उसको नियति-सहज माना। मानव अपनी कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता वश शरीर को अमर माना है, उससे दुखी होना निश्चित ही है। शरीर को जीवन मानते हैं, तो शरीर में होने वाला छोटा सा परिवर्तन हमको भयंकर विध्न जैसा प्रतीत होने लगता है। इसीलिये – शरीर को शरीर मानने की आवश्यकता है, जीवन को जीवन मानने की आवश्यकता है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव संज्ञा में होने की बात को स्वीकारने की आवश्यकता है। इन स्वीकृतियों के साथ हम विवेक पूर्वक जीते हैं। विवेक पूर्वक जीने से हम सुखी होते हैं।
विवेक को हटाया – मतलब, “जीवन के अमरत्व” को भुलावा दे दिया। फ़िर हमारे लिए शरीर ही जीवन हो गया। शरीर को जीवन मानने के बाद दुःख का रोड़ा शुरू हो गया। इतना ही बात है।
इस तरह से मनुष्य के पास ये पाँच विभूतियाँ (रूप, बल, पद, धन, और बुद्धि) सदा-सदा है। कोई आदमी नहीं है, जो इन पाँचों से रिक्त हो। अपने में इनको अनुभव करना है, कि मैं इन पाँचों से संपन्न मनुष्य हूँ। ये बात पता चला – हम सभी सुखी होने के इच्छुक हैं। फ़िर रूप के साथ सद्चरित्र, बल के साथ दया, धन के साथ उदारता, पद के साथ न्याय, और बुद्धि के साथ विवेक पूर्वक हम सुखी होते हैं। इतना ही बात है।
सारा मनुष्य जाति का सुखी या दुखी होने का इतिहास इतना ही है। चाहे विगत में हो, वर्तमान में हो, या भविष्य में हो। तीनो काल में सुखी या दुखी होने की प्रक्रिया इतना ही है। ये “निर्णायक” विधि से स्पष्ट है। “निर्णायक” मतलब – इसमें अब तर्क कुछ भी नहीं है।-
श्रद्धेय बाबा श्री नागराज जी के उदबोधन से
(अनुभव शिविर २००६, अमरकंटक)
आभार – मध्यस्थ दर्शन