अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग-१
यह जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन सुखद, सुंदर, सौभाग्य-पूर्ण हो – यह मेरी शुभ कामना है। मूल में मुझे यह बताने के लिए कहा गया है की इस अनुसंधान को करने का “संकट” मुझे कैसे आ गया? यह अनुसंधान हुआ कैसे? इस अनुसंधान को “विकल्प” स्वरूप में प्रस्तुत करने की क्या ज़रूरत आ गयी थी? इन सब बातों पर ध्यान दिलाने के लिए यह मेरी प्रस्तुति है।
मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा – मेरी शरीर-यात्रा ईश्वर-वादी विचार के अनुसार विद्वान कहलाने वाले वेद-मूर्ती परिवार में शुरू हुई। उस परिवार में मैंने पलने से लेकर ६-७ वर्ष या १० वर्ष तक वेद-विचार के अलावा कुछ श्रवण किया ही नहीं। या ऐसा कह सकते हैं – दूसरी कोई बात मेरे मन में पहुँची ही नहीं। मेरी आयु जब ५ वर्ष रही होगी – तब बहुत सारे बड़े-बुजुर्ग लोग मुझे प्रणाम किया करते थे। मुझ में यह विचार आया – “मुझको ये लोग प्रणाम करते हैं – इनको मैंने ऐसा क्या दे दिया है? ये लोग क्यों मुझे प्रणाम करते हैं?” मैंने इस बारे में अपने घर-परिवार, माता-पिता, भाइयों, मामा के साथ बात की तो वे उसका मखौल उडाते रहे। यह सब चलते चलते १०-१२ वर्ष बाद मुझको इस बात का बोध हुआ, ये लोग मेरे परिवार का सम्मान करते हैं – और उसी आधार पर मेरा सम्मान करते हैं। यह जो मुझ में निष्कर्ष निकला उससे इस बात की मुझ में प्रतिज्ञा बनी, हमारा परिवार जो सम्मान और प्रतिष्ठा बनाया है, उसको बरबाद करने का अधिकार मुझको नहीं है।
उसके बाद मैं वहीं न रुक कर, मेरा परिवार संसार को क्या दे दिया – इस को मैं शोध करने लगा। यह शोध करने पर पता चला – मेरे परिवार की परम्परा में हर पीढी में एक-दो संन्यासी होते ही रहे। उनमें से कई संन्यासी तो ऐसे हुए, जो अपनी समाधी के लिए स्वयं गड्ढा खोद कर मिट्टी डाल कर मर गए। मर जाने के बाद उनके ऊपर चबूतरा बना कर रखे हुए थे। मैंने अपने परिवार-जनों से पूछा “ये हमको क्या दे गए?” इसका उत्तर देने में काफी परेशानी उनको होने लगी। अंततोगत्वा यह बताया – शास्त्रों में “संन्यास” के बारे में लिखा है कि उससे कल्याण होता है। “कल्याण होता है – तो उसका कोई गवाही होगी कि नहीं?” – यहाँ से मैंने शुरू किया। ऐसा शुरू करने पर तकलीफ और बढ़ी। यह बढ़ते-बढ़ते मुझ को अंततोगत्वा समझाया गया – तुम पूरा वेदान्त को समझो। मैं फ़िर वेदान्त को समझने गया।
वेदान्त को मैंने पूरा ठीक समझा। लेकिन उससे तो वही हुआ – “पहले से करेला, ऊपर से नीम चढा!” वेदान्त के अध्ययन से मुझे पता चला – “यह ब्रह्म ही बंधन और मोक्ष का कारण है।”
ब्रह्म-ज्ञान क्या है? – तो रहस्यमय बताया। “ब्रह्म अव्यक्त है, अनिर्वचनीय है ” – यह बात की मुझे सूचना दिए। यदि ब्रह्म अव्यक्त है, अनिर्वचनीय है – तो ऐसी स्थिति में “ब्रह्म-ज्ञान” का क्या मतलब होगा? ऐसा मैं तर्क करने लगा। उस पर मुझे बताया गया – “तुम छोटा मुहँ बड़ी बात करते हो। ” इस प्रकार मुझ से मेरे परिवार में काफी संकट गहराया।
ब्रह्म ही बंधन और मोक्ष का कारण कैसे हो गया? मैंने पूछा तो बताया – यह “ब्रह्म-लीला” है। यह सुनने पर मैंने कहा – देखिये, संसार में जो दारु पीते हैं, वे बढ़िया लीला करते हैं। जो पागल हो जाते हैं – उससे बढ़िया लीला करते हैं। क्या ब्रह्म को पागल या दारु पिया हुआ माना जाए? यदि ऐसा नहीं माना जाए – तो उसका तरीका क्या है? यह सब होने पर वे मुझ को समझाए – “इसको समझने के लिए तुमको स्वयं अनुभव करना पड़ेगा।”
क्या अनुभव होता है? – मैंने पूछा।
“समाधि में अनुभव होता है” – उत्तर मिला।
किस बात का अनुभव? – मैंने पूछा।
“ज्ञान का” – यह बात बताये।
यह बताया तो मैंने समाधि के लिए तैय्यारी कर लिया। अपने मन को तैयार किया – कि इसके लिए मुझको यह शरीर यात्रा अर्पित करना है। उस समय मेरी आयु २६-२७ वर्ष रहा होगा। परम्परा को छोड़ कर अपने मन का कुछ करना है – उसके लिए शास्त्रों में “विद्वत-संन्यास” की बात लिखा है। विद्वत-संन्यास के बारे में लिखा है – ऐसा कुछ काम करने के लिए पत्नी का अनुमति चाहिए, माँ का अनुमति चाहिए, और गुरु का अनुमति चाहिए।
उस बारे में मैंने अपने पत्नी से एक गोष्ठी किया, अपना विचार व्यक्त किया – कि इस प्रकार से मेरे मन में ऐसा निश्चय हो रहा है। इसमें तुम्हारा क्या कहना है? “तुम जो निर्णय लोगे उसी के साथ मुझे चलना है।” – ऐसा वह बोली। मैंने बहुत तर्क दिया – इस में यह खतरा हो सकता है, वह हो सकता है, बहुत सारी कल्पना। यह सब बात मैंने की। अंततोगत्वा उनको साथ ही चलना है – यही ठोस निर्णय आया।
उसके बाद मैंने अपनी माँ से बात किया। मेरी माँ मेरे लिए पहले से ही गुरु-तुल्य रही थी। उन्ही से मैंने ज्योतिष और आयुर्वेद सीखा था। उसके आलावा मेरे घर पर “श्री विद्या आगम-तंत्र-उपासना” की परम्परा रही थी, उसका उपदेश उन्हों ने ही मुझे दिया। इसी अर्थ में मेरी माँ मेरे लिए गुरु-तुल्य थी। उनसे पूछा तो वे बताईं – “तुम जो कुछ भी निर्णय लोगे – उससे अच्छा निर्णय लेने वाला इस धरती पर कोई नहीं है। तुम जो निर्णय लो – उसे कर डालो, तुम उसमें सफल होगे।” ऐसा उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया।
उसके बाद श्रृंगेरी के विद्या-पीठ के शंकराचार्य को मैंने अपनी आस्था का केन्द्र बनाया था – उनसे मैंने इस बात का जिक्र किया। उन्होंने बताया – “तुम्हारा संकल्प ठीक है। तुम सफल हो जाओगे। नर्मदा किनारे भजन करो।” ऐसा वे बोले।
यह कुल मिला कर combination बनी। उसके बाद मैंने अपने पिताश्री से बात किया। पिताजी ने यह बताया – तुम वेद मानते हो, अध्यात्म मानते हो, तो जब तक हम जीते हैं – तब तक तुमाहरा जप, यज्ञ, तप सब कुछ हम ही हैं। हमारी सेवा करना ही तुम्हारा धर्म है – ऐसा वे बोले।
उसके बाद अपने ससुरजी से बात किया। वे बोले – तुम ६० वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ जाना। मैंने धीरे से उनसे पूछा – आपका आयु कितना है? उन्होंने बताया – ६२ वर्ष! मैंने पूछा – फ़िर यहाँ कैसे दिख रहे हो?! सुन कर वे चले गए! यह भी एक मखौल की बात है।
इस तरह परामर्श के तौर पर मैंने सबसे बात किया – और समाधि के लिए जाने का निष्कर्ष निकाला।
- अक्टूबर २००५ मसूरी में जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के संबोधन पर आधारित।
सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन (जीवन विद्या -सह अस्तित्व में अध्ययन)
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अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग-२
सबसे परामर्श करके मैंने समाधि के लिए जाने का निष्कर्ष लिया। निष्कर्ष में तो मैं आ ही गया था – कि मुझको यह करना ही है, एक शरीर यात्रा इसमें अर्पित करना ही है। मैंने कुछ तिथि निश्चित किया कि इस तिथि में चले जायेंगे। तब तक अपने सभी क्रियाकलापों, लेन-देन आदि सब को पूरा करने में मैं लगा। इसी बीच में मेरी माँ का देहांत हो गया। यह १९४७ के अंत में हुआ। और १९४८ के आरम्भ में मेरे पिता का भी शरीर शांत हो गया। वहाँ की परम्परा के अनुसार १ वर्ष तक मरणोत्तर कर्मो में सम्मान देते हैं, ऐसी आस्था रखते हैं। उसको मैंने पूरा किया। वह सब पूरा होने पर १९५० में हम यहाँ अमरकंटक पहुँच गए।
अमरकंटक – इस पावन स्थली पर पहुँच कर हमको बहुत अच्छा लगा। यहाँ के लोग, हवा, पानी, जंगल, जानवर, धरती – इन सबके साथ हमारी सानुकूलता बनी। वहाँ जो २००-२५० लोग उस समय थे – उनके साथ भी हमारा स्नेह और विशवास पूर्वक जीने का आधार बना। हमको ऐसा लगा – वहाँ जितने भी लोग हैं, वे सभी हमारे अभिभावक हैं, संरक्षक है। ये सभी बात सानुकूल होने पर मैं साधना कर पाया। यह सानुकूलताएं जो अपने आप में मुझ को सुलभ हुई, (उसका कारण) मैंने माना – यह नियति का देन है, बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद है, या मानव का पुण्य है।
यह सब होने के बाद अपनी साधना में मैं तत्पर हुआ, उसके लिए किया-धरा, उस सब में २० वर्ष लगे। २० वर्ष बाद मैं समाधि की स्थिति में पहुँच गया।
समाधि की स्थिति में मैंने पाया – मेरा आशा, विचार, इच्छा जो दौड़ता रहता था – “मुझे कुछ चाहिए”, “मुझे कुछ करना है”, “मेरे पास कुछ है” – ये तीनो पूरा का पूरा चुप हो गए। ये चुप होने के बाद आदमी को कोई संकट तो होता नहीं है। आशा-विचार-इच्छा चुप हो जाने के बाद संकट काहे को होगा? ये चुप होने के बाद मैं हर दिन इंतज़ार करता रहा – आज ब्रह्म ज्ञान होगा, आज होगा… ऐसा करते करते कई महीने इंतज़ार में बीत गए।
समाधि में मुझको ब्रह्म-ज्ञान नहीं हुआ।
समाधि में ब्रह्म-ज्ञान नहीं होता – इसको मेरे कहने भर से कौन मानने वाला है? शास्त्रों में तो इसके विपरीत लिखा है। समाधि मुझ को हुआ है या नहीं – इसका गवाही देने के लिए मैंने “संयम” किया। संयम के द्वारा समाधि का गवाही हो जाता है। फ़िर संयम करने का संकल्प ले कर मैं लग गया।
पंतांजलि योग-सूत्र में संयम के लिए विभूति-पाद में जो कुछ भी लिखा है – वह कोई ज्ञान के लिए नहीं है। “अज्ञात को ज्ञात” और “अप्राप्त को प्राप्त” करने के उद्देश्य की पहले से घंटी बजती रही। उसमें से “अप्राप्त को प्राप्त करने” को लेकर मेरी कोई जिज्ञासा नहीं रही। मुझको ऐसा महसूस ही नहीं हुआ – मेरे पास कुछ अप्राप्त है। अभाव मुझको स्पर्श ही नहीं किया था। अप्राप्त को प्राप्त करने की मुझ में कोई जिज्ञासा नहीं रही, आवश्यकता भी नहीं रही। इसको आप मेरा पागलपन भी कह सकते हैं, मेरी सच्चाई भी कह सकते हैं। अब क्या किया जाए? अज्ञात को ज्ञात कैसे किया जाए – यही बात हुई। उस सन्दर्भ में लिखा है – “धारणा-ध्यान-समाधिः त्रयम एकत्रत्वा संयमः”। ऐसा एक लाइन लिखा है। उसको मैंने उलटाया। “समाधि-ध्यान-धारणा त्रयम एकत्रत्वा संयमः” – ऐसा मैंने दूसरा लाइन तैयार किया। अप्राप्त को प्राप्त करने की एक भी विधि को मुझे नहीं अपनाना है – ऐसा मैंने सोचा। अज्ञात को ज्ञात करना उसके उल्टा विधि से होगा – उस विधि से करके देखा जाए! ऐसा मेरा मन पहुँचा। और फ़िर उसको मैंने किया।
यह करने पर एक वर्ष में मैं उस जगह पर पहुँचा जहाँ – अस्तित्व कैसा है, क्यों है? और मानव कैसा है, क्यों है? – इन दोनों का उत्तर मुझे मिल गया। इन दोनों ध्रुवों के बीच में संसार का जो कुछ भी क्रिया-कलाप है – भौतिक, रासायनिक, और जीवन क्रियाकलाप – उसका मुझे साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार होने पर मैं संतुष्ट हुआ।
- अक्टूबर २००५ मसूरी में जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के संबोधन पर आधारित।
सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या- सह अस्तित्व में अध्ययन)
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अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग-३
साक्षात्कार पूर्वक मुझ को पता चला : –
(१) हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त स्वरूप में है।
(२) जीवन एक गठन-पूर्ण परमाणु है।
(३) जीवन में दो और पूर्णतायें – क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता – मानव परम्परा में ही घटित होता है।
मुझको यह समझ में आया – मनुष्य जीव-चेतना वश भ्रमित हो कर संकट से घिर जाता है। फ़िर मानव-चेतना पूर्वक सुखी होना होता है – यही क्रिया पूर्णता है। इस तरह पता चला – जीव-चेतना से मानव-चेतना श्रेष्ठ है। मानव-चेतना से देव-चेतना श्रेष्ठतर है। देव-चेतना से दिव्य-चेतना श्रेष्ठतर है। यह अनुभव होने के बाद मैं अपने में सुद्रढ़ हुआ। जागृति का अधिकार मुझे मिल गया।
जागृति के अधिकार के फलस्वरूप पता चला – मनुष्य भ्रम-वश ही बंधन की पीड़ा से पीड़ित है। क्या चीज है भ्रम या बंधन? वह है – अति-व्याप्ति दोष (अधिमुल्यन करना) , अना-व्याप्ति दोष (अवमूल्यन करना) , और अव्याप्ति दोष (निर्मुल्यन करना) । इन तीन दोषों से ही हम संकट में फंसते हैं। छल, कपट, दंभ, पाखण्ड – यह अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति, और अव्याप्ति दोषों का प्रदर्शन है। दूसरी विधि से जो हम फंसे हैं – वह है – द्रोह, विद्रोह, शोषण, और युद्ध। इस तरह मनुष्य इन दो भंवरों में फंस गया। इसके पहले साम-दाम-दंड-भेद का भंवर बना ही रहा। इस तरह मानव एक साथ तीन भवरों में फंसा हुआ है। मनुष्य जाति कैसे जी पा रही है – आप ही सोच लो!
यह जो ज्ञान मुझे हुआ – यह १९७५ में हुआ। यह ज्ञान होने पर मैंने स्वीकारा – यह मेरे अकेले का ज्ञान नहीं है। यह मानव का ज्ञान है। मानव के पुण्य वश ही यह घटित हुआ है। इसलिए मानव को इसे अर्पित करना है। उसके बाद मनुष्य के साथ संपर्क करने का कोशिश किया। कोशिश करने के क्रम में कुछ लोगों ने कहा – “तुम आशावादी हो!” कुछ ने कहा – “समय से पहले तुम यह बात कर रहे हो।” कुछ ने कहा – “जैसे और कई विचार आए – तुम्हारा भी यह एक विचार है – थोड़ी देर बाद यह भी ख़त्म हो जायेगा। ” इन तीन प्रकार की opinions आयी। मैं चिंतन-मनन करता रहा, और उसी के साथ अच्छे-अच्छे लोगों से मिलन होते ही रहे। धीरे-धीरे मुझको यह धैर्य हुआ कि इस बात की आवश्यकता मानव-परम्परा को है।
उसके बाद १९९० से हमने शुरू किया कि इसे सटीक विधि से एक शैक्षणिक प्रणाली के रूप में लोगों के सम्मुख रखा जाए। उसमें दो-तीन जगह में इस बात के प्रयोग हुए हैं, काफी बुद्दिमान लोग इसमें सोचने के लिए तत्पर हुए हैं। यह आज तक की घटित घटनाएं यहाँ तक पहुँची हैं।
- अक्टूबर २००५ मसूरी में जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के संबोधन पर आधारित।
सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)
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अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग ४
अनुसंधान के फल में जो हाथ लगा उसमें कुल मिला कर “समझदारी” की बात है। अभी तक क्या था? अभी तक समझदारी था कि नहीं था? यह आप पूछो तो मेरे समझ में यह आता है – अध्यात्मवाद रहस्य में फंसने से आदमी को हाथ नहीं लगा। रहस्य में ही रह गया। उसमें हमने माना मरने के बाद हमको स्वर्ग मिलेगा, मोक्ष मिलेगा, ज्ञान का फल मिलेगा, देवता मिलेंगे – इस प्रकार की बहुत सारी परिकल्पनाएं रखी हुई हैं। मरने के बाद क्या मिलता है – उसकी कोई गवाही तो हो ही नहीं सकती।
इस समझदारी से मानव-लक्ष्य स्पष्ट हुआ। मानव-लक्ष्य है – समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व प्रमाण। मानव-लक्ष्य को पूरा करना ही मानव-चेतना है।
समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि – यह एक formula बना। समझदारी से समाधान-संपन्न हो सकते हैं। हर समझदार परिवार में अपनी आवश्यकता का निर्णय कर सकते हैं। आवश्यकता से अधिक उत्पादन करके समृद्धि का अनुभव कर सकते हैं।
इस आधार पर इस पूरी बात को अध्याव्सायिक विधि से प्रस्तुत करने की कोशिश किए। प्रस्तुत करने के क्रम में सर्वप्रथम मैंने बंगलोर में एक “अध्ययन शिविर” लगाया। ४५ दिन का शिविर था। बहुत सारे लोग इसको सराहे, इसकी आवश्यकता है – ऐसा बोले। इसके बाद धीरे-धीरे रायपुर, भिलाई – इन जगहों पर विद्वानों के संपर्क में आए। उसके बाद दुर्ग में एक polytechnic institute के संपर्क में आए, जहाँ के लोगों ने जीवन-विद्या का शिविर किया। विज्ञान को पढ़े हुए लोगों के साथ मैंने एक जीवन-विद्या शिविर किया। इस शिविर करने के बाद उनमें कुछ संतोष और धैर्य हुआ, उसके बाद वही polytechnic institute द्वारा IIT Delhi से संपर्क हुआ। IIT Delhi के विद्वानों का तरीका कुछ दूसरा ही रहा!
वहाँ पहुँचते ही वे मुझसे कहे – “तुम्हारी प्रस्तुति का आधार क्या है? जो बात तुम कह रहे हो – यह किसी सिद्धांत पर आधारित है या नहीं?”
इससे मुझको ऐसा झलका, ये पूछ रहे हैं – “मैं किस परम्परा के आधार पर बात कर रहा हूँ? -उसको लेकर मेरा उदगार चाह रहे हैं। ” किंतु मेरी बात किसी परम्परा पर आधारित नहीं रहा।
इसका सीधा उत्तर मैंने दिया – “मेरी बात का आधार है – सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व। और इस बात का प्रमाण मैं स्वयं हूँ।” इस प्रकार से मैं प्रस्तुत हुआ।
इस प्रकार वहाँ के जो तत्कालीन विद्वान थे – उनमें से कुछ लोगों को सुनकर काफी अच्छा लगा, तो कुछ को लगा यह बिल्कुल पाखंडी आदमी है – बस बात करने वाला है। ऐसा दो तरह की बात हुई। इसके बाद उनसे मंगल-मैत्री, ज्ञान-अर्जन करने-कराने की बातचीत शुरू हुई। अंततोगत्वा IIT में यह प्रवृत्ति बनी – “यह कुछ सही चीज़ है, इस पर प्रयोग करके देखना चाहिए।”
उनमें से एक आदमी – रण सिंह, जो हमारे पास यहाँ बैठे हैं – वहाँ से तत्काल resign किए, और मेरे पास ६ महीने अमरकंटक में आ कर रहे। ६ महीने हमारे पास रह कर उन्होंने जितनी भी स्वयं में जिज्ञासाएं थी उनके उत्तर पा कर के अपने में ऐसा महसूस किया कि हमको कुछ समझ में बात आ गयी। उसको प्रयोग करने के लिए वे अपने में तैय्यारी कर लिए, और ये अपने ढंग से अब तक प्रयोग कर भी रहे हैं। इनके धैर्य में अब तक कोई घाटा नहीं आया। ऐसा भी नहीं आया, हम जो अब तक समझे हैं – वह ग़लत हो गया। यह दोनों नहीं आने से धैर्य भी रहा, अपनी समझ पर विश्वास भी रहा – और उसके आधार पर आप अपने में अभी तक जुटे हैं। बिजनौर और आस-पास के गावों में उनका पहले से भी पहचान था, ये पहले से वहाँ के स्थापित व्यक्ति रहे। इनके बात पर वहाँ के लोगों की आस्था है, उसके आधार पर लोग उनकी बात सुनते हैं और आस्था प्रकट करते हैं।
इनके जुड़ने के बाद IIT में सत्य जी जुड़े। IIT में सबसे अधिक बुद्धिमान, विद्वान जिसे माना जाए – ऐसे थे यशपाल सत्य। वे fission fusion के विद्वान थे – उनको वह व्यवहारिक नहीं दिखा। उससे उनको संतोष नहीं हुआ। वे इस विद्या को पा कर इतना गद-गद हुए! उन्होंने बहुत सारे उपनिषद् आदि पढ़े थे – उसके आधार पर उन्होंने बताया – “विगत में यह सब कहा है – यह बात (मध्यस्थ-दर्शन) उससे आगे की चीज है।” वे बहुत कुछ आगे करने वाले थे, पर संयोग-वश उनका हमसे वियोग हो गया।
उसके बाद कानपूर में एक संस्था तैयार हुई – उसके प्रधान व्यक्ति गणेश बागरिया रहे। वह कार्यक्रम अभी तक चल रहा है। उसके बाद रायपुर में एक और संस्था चली – उसमें और आगे बढ़ने की बात आयी। वहाँ भी लोग काफी जुड़े हैं, और प्रयत्न कर रहे हैं। इस तरह जगह-जगह पर प्रयत्न चल रहे हैं।
- अक्टूबर २००५ मसूरी में जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा के संबोधन पर आधारित।
सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)
लिंक- madhyasth Darshan
अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग ५
कुल मिला कर “अध्यात्मवाद की रहस्यमयता” मेरे अनुसंधान का कारण रहा। अस्तित्व में रहस्य होने का कोई कारण नहीं है। अध्यात्म या ब्रह्म जैसे वस्तु का अव्यक्त रहने का कोई कारण नहीं है। अनुसंधान से पता चला – ब्रह्म सभी वस्तुओं को प्राप्त है। प्राप्त का अनुभव करने का मानव के पास अधिकार है। वह अनुभव सह-अस्तित्व स्वरूप में होता है। यह मैंने अनुभव किया है।
इस प्रकार सह-अस्तित्व समझ में आने के बाद उसको literature स्वरूप में दर्शन, वाद, और शास्त्र रूप में दिया।
दर्शन रूप में नाम दिया गया है –
मानव व्यवहार दर्शन,
मानव कर्म दर्शन,
मानव अभ्यास दर्शन, और
अनुभव दर्शन।
उसके बाद विचार में नाम दिया –
समाधानात्मक भौतिकवाद ,
व्यवहारात्मक जनवाद , और
अनुभवात्मक अध्यात्मवाद।
उसके बाद शास्त्रों का नाम दिया –
आवर्तनशील अर्थशास्त्र ,
व्यवहारवादी समाजशास्त्र ,
मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान।
उसके बाद संविधान लिखा –
मानवीय आचार संहिता रुपी संविधान।
उस ढंग से मानव को जो आवश्यकता है – आचरण से संविधान तक, संविधान से व्यवस्था तक – हर आदमी जो जांच सकता है, उसका पूरा व्याख्या प्रस्तुत किया। उसमें धीरे-धीरे लोगों का भरोसा तो बन ही रहा है। इस प्रकार जितने भी लोग इस विचार से जुड़ रहे हैं, उनका भरोसा की बात तो पूरा पड़ता है। इस बात को लेकर जीवन-विद्या का कार्यक्रम जहाँ-जहाँ होता है, जीवन-विद्या को जो-जो सुनते हैं, उनमें नवीन उत्साह जगता है। उसके बाद जिज्ञासा के आधार पर आगे विद्वान होना बनता ही है।
इस तरह अनुसंधान की यह छोटी सी बात हुई। केवल मुझ में स्वयं में रहस्यवाद से पैदा हुआ संकट और भौतिकवाद से पैदा हुआ संकट (धरती बीमार होने के रूप में ) – इन दोनों से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्न, उस प्रयत्न में मेरी सफलता समाधि-संयम पूर्वक होना, उसको मानव को अर्पित करने के लिए प्रयत्न, और यहाँ आप तक पहुँचने का सौभाग्य।
जय हो! मंगल हो! कल्याण हो!
- अक्टूबर २००५ मसूरी में जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन में बाबा श्री नागराज शर्मा जी के संबोधन पर आधारित।
सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह- अस्तित्व में अध्ययन)
लिंक- madhyasth Darshan