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बंधन का स्वरूप

बंधन का स्वरूप

Posted on January 16, 2024

बंधन का स्वरूप

(१) भ्रम ही बंधन है।

जीवन भ्रमित होता है। जीवन में भ्रम आशा, विचार, और इच्छा के स्तर पर होता है। भ्रम (आशा बंधन, विचार बंधन, इच्छा बंधन) का मूल रूप है – शरीर को जीवन मान लेना। अस्तित्व विरोधी मान्यताएं ही भ्रम हैं।

आशा बंधन = भ्रमित मन। उस स्थिति में मन सम्मोहन विधि से शरीर के आकार में प्रभावित रहता है। फलतः सारा अनुभव का केन्द्र शरीर को मान लेता है। ऐसे भ्रमित-मन के पक्ष में ही विचार और इच्छा भी प्रवृत्त हो जाते हैं। आशा बंधन का कार्य-रूप है – इन्द्रिय आस्वदानो को लक्ष्य मान लेना, और उसी के लिए जीवन-शक्तियों को लगा देना।

विचार बंधन = भ्रमित वृत्ति । अपने भ्रम से प्रस्तुत तर्क को सर्वाधिक सत्य मान लेना, दूसरे के भ्रम से प्रस्तुत तर्क को अपना विरोधी मान लेना।

इच्छा बंधन = भ्रमित चित्त। अपने भ्रम पर आधारित लक्ष्य, योजना, कार्य-योजना के प्रति अपना ही चिपकाव। जैसे – भौतिकवादिता के भ्रम से लक्ष्य बनता है, सुविधा-संग्रह का। सुविधा-संग्रह के अर्थ में ही योजना, और कार्य-योजना। उस विधि से जो शिक्षा का स्वरूप बनता है, उससे हर विद्यार्थी का लक्ष्य नौकरी (वेतन भोगिता) अथवा व्यापारी (शोषण) के रूप में स्थापित होना बन जाता है।

भ्रम पर आधारित जो systems मनुष्य बनाता है, उनमें भय, प्रलोभन, और आस्था – इन तीनो का प्रयोग करना विवशता हो जाती है। यही बंधन है।

भ्रम का कार्य-रूप है – अधिमुल्यन, अवमूल्यन, और निर्मूल्यन। भ्रमित व्यक्ति सही मूल्यांकन कर पाने में असमर्थ होता है।

प्रश्न: कौन भ्रमित होता है? क्या वस्तु बंधन में होता है?

उत्तर: जीवन भ्रमित होता है। जीवन जागृति-पर्यंत बंधन में रहता है। जीवन में यह चित्रण तक ही होता है। बुद्धि भ्रमित नहीं होती।

जीवन ही जागृति-पूर्वक भ्रम-बंधन से मुक्त होता है। बंधन-मुक्ति ही जीवन-जागृति है।

प्रश्न: क्या चीज है जो जीवन को बाँध कर रखती है?

उत्तर: अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो जीवन को बाँध सकती हो। जागृति से पहले जीवन में जो आशा-विचार-इच्छा से जो भय, प्रलोभन, और आस्थावादी क्रियाकलाप होते हैं – ये भ्रम रूप होते हैं। जागृति से पहले जीवन ही भ्रम को स्वीकारे रहता है। यही जीवन का बंधन है।

(२) बंधन ही पीड़ा है।

भ्रमित मनुष्य समस्याओं से पीड़ित रहता है। जीवन में भ्रम-बंधन की पीड़ा समस्याओं के रूप में अपने आप स्पष्ट होती है।

क्या वस्तु है जो पीड़ित होती है?

जीवन ही वह वस्तु है जो पीड़ित होता है।

मनुष्य पीड़ा नहीं चाहता। हर मनुष्य पीड़ा से मुक्ति ही चाहता है। पीड़ा से मुक्ति के लिए मनुष्य निरंतर प्रयास-रत रहता है। जीवन भ्रम-वश पीड़ित होता है, तभी उसमें जागृति की आवश्यकता बनती है। यही मनुष्य में जागृति की सम्भावना है। जीवन ही वह वस्तु है जो जागृत होता है।

मनुष्य को बेहोशी में पीडा नहीं होती। लेकिन बेहोशी में रहना व्यवस्था का आधार नहीं हो सकता। सारी मनुष्य-जाति बेहोश हो जाए – तो भी व्यवस्था नहीं हो सकती। मनुष्य में जागृति ही व्यवस्था का आधार हो सकता है।

भ्रम और बंधन की पीड़ा की पराकाष्ठा किसी न किसी व्यक्ति को होना आवश्यक था। यह नियति-क्रम में विधि-वत घटित हो ही जाता है। इसी क्रम में किसी एक व्यक्ति द्वारा अनुसंधान का सफल होना हुआ। क्योंकि सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में जागृति निश्चित है।

मध्यस्थ-दर्शन का अनुसंधान इसीलिए हुआ। इस अनुसंधान के मूल में रूढियों के प्रति अविश्वास, कट्टरपंथ के प्रति अविश्वास रहा है। वेदों का सार भाग १०८ उपनिषदों के रूप में है, जिनका सार वेदान्त है – ऐसा बताया गया है। वेदान्त में “मोक्ष और बंधन” पर जो कुछ भी लिखा गया है, उस पर शंका हुई। ब्रह्म ही सत्य है, ज्ञान है, अनंत है – और ब्रह्म से ही जीव-जगत पैदा हुआ है – ऐसा बताया गया है। वेदान्त की अन्तिम भाषा है – “ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या”! मूल प्रश्न यह बना – “सत्य से मिथ्या कैसे पैदा होता है?” फ़िर उसके लिए शास्त्रों में जो निदिध्यासन, समाधि, मनोरोध के लिए जो कुछ भी उपदेश दिया गया है, उसी के आधार पर प्रयत्न और अभ्यास किया गया। निर्विचार स्थिति या समाधि को प्राप्त करने के बाद भी उस स्थली में मूल-शंका का उत्तर नहीं मिल पाया। समाधि के सत्यापन के लिए ‘संयम’ किया गया। संयम के फल-स्वरूप अस्तित्व का अध्ययन हुआ। जिसके फलन में सह-अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व में अनुभव हुआ।

प्रश्न: जीव-जानवरों में क्या भ्रम की पीड़ा नहीं होती? जीवों में क्या जागृति के प्रमाणित होने की सम्भावना है?

उत्तर: जीवों में जीवन की अभिव्यक्ति जीने की आशा तक ही सीमित रहती है। यह वंश-अनुशंगियता के रूप में जीवन द्वारा प्रिय-हित-लाभ दृष्टियों के आंशिक प्रयोग से जीवनी-क्रम की वंश-परम्पराओं को बनाए रखने के रूप में साक्षित होती है। यह भ्रम का पहला चरण है। इस चरण में भ्रम की पीड़ा या बंधन की पीड़ा प्रमाणित नहीं होती। जीव-परम्परा में जीवन-जागृति के प्रमाणित होने की कोई सम्भावना भी नहीं है। भ्रम की पीड़ा मनुष्य में ही प्रकट होती है। जीवन-जागृति के प्रमाणित होने की सम्भावना मनुष्य में ही है। जागृति “चिंतन बल” विधि से आरम्भ होता है, यह मनुष्य में ही सम्भव है।

(३) पीड़ा समाधान के अभाव का संकेत है।

समाधान के अभाव में जीवन पीड़ित है। समाधान है, तो समस्या हो ही नहीं सकती। समाधान और समस्या का कोई मेल नहीं है। भ्रम वश ही समस्या है।

प्रश्न: समाधान क्या है?

जीवन जब सह-अस्तित्व में अनुभूत होता है, तब मनुष्य के जीने में समाधान होता है। सह-अस्तित्व में अनुभव के लिए ही मध्यस्थ-दर्शन के अध्ययन का प्रस्ताव है। समाधान ही सुख है। जीवन में सुख होता है, तो जीने में समाधान होता है।

स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन (अनुभवात्मक अध्यात्मवाद), बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद (वैदिक विचार की विसंगति, अनुसन्धान, और विकल्प, संयम काल में अध्ययन, भ्रम का कार्य-रूप )

सूचना स्रोत- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)

सभार मध्यस्थ दर्शन

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“भूमि स्वर्गताम यातु
मनुष्य यातु देवताम्:
धर्मो सफलताम यातु
नित्यं यातु शुभोदयम्I “

-A.Nagraj, Propounder- Madhyasth Darshan

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