भाई-बहन संबंधः भाई-बहन संबंध को सौहार्द्र भाव के नाम से जाना जाता है। इस में परस्पर जागृति की प्रत्याशा एवं उत्साह है। एक की जागृति दूसरे पक्ष के जागृति को आप्लावित कर देता है। जैसे यदि कोइ बहन किन्ही विशेष सद्गुणों से संपन्न है तो इसके कारण बहन स्वयं में जितना आप्लावित है उतना ही अथवा उससे अधिक आप्लावन भाई में पाया जाता है। इस प्रकार भाई का भाई के साथ और बहन का बहन के साथ पाया जाता है।
भाई-बहन की पहचान एक निश्चित आयु में हो पाती है। पहचान होते ही परस्परता में सच्चाई, समझदारी और जागृतपरिवार सम्मत अपेक्षा के अनुसार कौमार्यावस्था में आज्ञापालन, सहयोग और अनुसरण रहता है और साथ में परस्पर मूल्यांकन होना पाया जाता है। यही मित्रों के साथ भी होता है।
कौमार्य और युवावस्था के बीच भाई-बहन, भाई-भाई, बहन-बहन की परस्परता में अनुशासन-आज्ञापालन के क्रम में एक पक्षिय हो पाते है। और जैसे ही युवावस्था में पहुंचते है, स्वाभाविक रुप से स्वानुशासन का प्रमाण होता ही है।
इस विधि से कार्य-व्यवहार, विचार संपन्न होते हुए भाई-बहन, मित्र संबंधो में विश्वासपूर्वक सम्मान व मूल्यांकनपूर्वक परस्परता में स्नेह मूल्य को सदा-सदा प्रमाणित करना होता है।
इस विधि से इन संबंधो में विश्वास, सम्मान, स्नेह मूल्य प्रधान रहता है साथ में प्रेम मूल्य स्पष्ट होना भावी रहता है।
स्त्रोत ः “मानव व्यवहार दर्शन” किताब, मध्यस्थ दर्शन..