मनुष्य जाति में आज तक शुभ से जीने की अपेक्षा तो रही, पर शुभ का मॉडल नहीं रहा। अब वह मॉडल आ गया है। स्वयं तृप्त होने के बाद उसको प्रमाणित करने करने की बात रहती है। multiply करने में बहुत से लोग शुभ का स्वागत करने के लिए बैठे हैं। बहुत से लोग शुभ को लेकर शंका करने के लिए भी बैठे हैं। इन दो चैनल में आपको आदमी मिलेगा ही। जो जिस चैनल में जाना चाहता है, जाए। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। जिसकी पहले ज़रूरत है, वह पहले आएगा – जिसकी ज़रूरत उसके बाद बनती है, वह उसके बाद आएगा। यह एक प्रस्ताव है, आवश्यकता के अनुसार ही यह स्वीकार होगा।
हर व्यक्ति समझदार होने योग्य है।
हर व्यक्ति सुखी होना चाहता है।
समझे बिना कोई सुखी होता नहीं है।
सुखी होने की चाहना जिसकी प्राथमिकता में पहले आता है, वह जल्दी समझेगा। जिसकी प्राथमिकता में बाद में आता है, वह बाद में समझेगा।
- बाबाजी श्री ए.नागराजजी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त २००६, अमरकंटक)
यथास्थिति को बनाए रखने के लिए, और अध्ययन न करने के लिए जितने हमारे सर में बाल हैं, उतने बहाने हैं। किसी आयु के बाद मनुष्य के बाद सच्चाई से दूर भागने के अनगिनत बहाने बन जाते हैं। साथ ही, किसी आयु के बाद अपने संस्कार-वश ही सच्चाई को शोध करने की भी कुछ लोगों में इच्छा रहती है। वह जो भाग है – उसी के साथ मैं और आप जुड़ रहे हैं। सच्चाई को शोध करने की इच्छा वाले लोग ही मेरे पास आते हैं। नहीं तो कोई आता नहीं है।
- बाबाजी श्री ए.नागराजजी के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७, अमरकंटक)
अनुभव एक व्यक्ति को हो सकता है, तो दूसरे को भी हो सकता है.
अनुभव एक व्यक्ति को हो सकता है, तो दूसरे को भी हो सकता है। एक व्यक्ति जो समझ सकता है, कर सकता है – वैसे ही हर व्यक्ति समझ सकता है, कर सकता है। अनुभव संपन्न व्यक्ति के निरीक्षण परीक्षण से एक से दूसरे व्यक्ति के लिए प्रेरणा बनती है। फ़िर उसके लिए दूसरे का प्रयत्नशील होना स्वाभाविक हो जाता है। उसी ढंग से सभी इस बात से जुड़ रहे हैं।
मेरे जीने के तौर-तरीके से जो मैं आप में अनुभव होने का आश्वासन दिलाता हूँ – उसमें तारतम्यता बनता जाता है। उससे आपका विश्वास दृढ़ होता जाता है।
प्रश्न: मुझसे पहले, मुझसे ज्यादा पढ़े- लिखे, अनेक वर्षों से अध्ययन में संलग्न लोग जब अपने अनुभव होने की स्पष्ट घोषणा नहीं कर पाते हैं – तो मेरा विश्वास डगमगा जाता है, कि मैं इसको कभी पूरा समझ पाऊंगा।
उत्तर: इसको escapism में न लगाया जाए। जिम्मेदारी के साथ हम समझते हैं, करते हैं। “हम समझेंगे, और अपनी समझ को जियेंगे।” – यहाँ तक आप अपनी जिम्मेवारी को रखिये। दूसरा समझा या नहीं समझा – उसको अभी मत सोचिये। आप पूरा होने के बाद संसार और ही कुछ दिखने लग जाता है। जैसे मुझ को दिख रहा है कि हर व्यक्ति शुभ चाह रहा है। शुभ के लिए ही सभी प्रयत्न कर रहे हैं। एक दिन पहुँच ही जायेंगे। मेरे पास किसी का विरोध करने का कोई रास्ता ही नहीं है। आप अनुभव करने के बाद वही करोगे, दूसरा कोई रास्ता नहीं है।
सबको आत्मसात किए बिना (अपना स्वीकारे बिना) हम समाधानित नहीं हो सकते। सबको आत्मसात कैसे करोगे? एक दिन सभी सच्चाई को समझेंगे। यह पहला कदम है। यह फ़िर मिटेगा नहीं। अब उसके बाद हम अपना प्रस्ताव देना शुरू किए। प्रस्ताव में लोगों को सम्भावना दिखने लगी। आपकी इस प्रस्ताव में स्वीकृति मुझ को दृढ़ता प्रदान करता है। उसी प्रकार आप जब दूसरों को प्रबोधित करते हैं तब उससे आप की सुदृढ़ता बनती है। इसमें कोई शंका की बात नही है। केवल ध्यान देने की आवश्यकता है। शरीर को हटा कर जीवन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
प्रश्न: क्या इस बात की कोई सम्भावना है कि इस अनुसंधान का लोकव्यापीकरण न हो? क्या इस बात की सम्भावना है कि आप के रहते कोई भी अपने अनुभव-संपन्न होने की स्पष्ट घोषणा नहीं कर पाये?
उत्तर: इस दशक में आने के बाद अब वह सम्भावना नहीं है। लोग इसको समझ जायेंगे और यह जिन्दा रहेगा – यह आश्वस्ति इस दशक के बाद से हुई। मानव को धरती पर रहना हो तो मध्यस्थ-दर्शन के अनुसंधान के सफल होने की घटना सही है। सन् २००० से पहले मैं कहता था – “मानव को धरती पर रहना होगा, तो इसको समझेगा नहीं तो नहीं समझेगा।” अब यह लोकव्यापीकरण हो के ही रहेगा। इस बात का प्रवाह बनेगा – यह तो निश्चित हो गया है। जो लोग इसके अध्ययन में लगे हैं, और प्रोग्राम में लगे हैं – उनके संकेतों से मुझको ऐसा ही लगता है।
[अप्रैल २००८, अमरकंटक]