विकास(जागृति) के लिए किये गये व्यवहार को पुरुषार्थ, निर्वाह के लिए किये गए व्यवहार को कर्तव्य तथा भोग के लिए किए गए व्यवहार को विवशता के नाम से जाना गया है।भोगरूपी आवश्यकताओं की पूर्ति इसलिए संभव नहीं है कि वह अनिश्चित एवं असीमित है। कर्तव्य की पूर्ति इसलिए संभव है कि वह निश्चित व सीमित है। यही कारण है कि कर्तव्यवादी प्रगति शांति की ओर तथा भोगवादी प्रवृत्ति अशांति की ओर उन्मुख है।*स्त्रोत : पृष्ठ-254, आवर्तनशील अर्थशास्त्र, मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद.*