जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना
“जानने” की वस्तु “नियम” हैं। नियम वे हैं – जो देश (स्थान) और काल (समय) के अनुसार बदलते नहीं हैं, और निरंतर बने रहते हैं। जैसे – पानी ढाल की ओर बहता है। यह एक नियम है। पानी हर जगह, हर समय ढाल की ओर ही बहता है। अस्तित्व का मूल नियम “सह-अस्तित्व” है। सह-अस्तित्व नियम स्थान और समय के अनुसार बदलता नहीं है। सह-अस्तित्व नियम इसलिए “जानने” की वस्तु है। मनुष्य में ही “जानने” की आवश्यकता है। पत्थर, पेड़-पौधे, और जीव-जानवरों में जानने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन जानने के लिए है।
“मानना” हमारी स्वीकृतियों को कहते हैं। हम को कैसे जीना है, इस बात के बारे में हम जो स्वीकारे रहते हैं – वही हमारी स्वीकृति है। कुछ स्वीकृतियां समय और स्थान के साथ बदलती हैं। जैसे – सर्दी में हम गर्म कपड़े पहनना स्वीकारते हैं। गरमी में हल्के और ढीले कपड़े पहनना स्वीकारते हैं। कुछ स्थानों पर हम हाथ मिला कर अभिवादन करते हैं, तो कुछ स्थानों पर कमर से झुक कर अभिवादन करते हैं। “जानने” पर आधारित स्वीकृतियां स्थान और समय के अनुसार नहीं बदलती। जैसे- एक बार हमने जान लिया कि पानी ढाल की तरफ़ ही बहता है, तो वह स्वीकृति हमारे साथ हर जगह और हर समय रहती है। उसी तरह एक बार हमने यदि जान लिया कि मानव के साथ व्यवहार का नियम “न्याय” ही है – तो हमारी न्याय में स्वीकृति हर स्थान और हर समय के लिए हो जाती है। स्वीकृतियां मनुष्य में होती ही हैं – चाहे वह “जान” कर हुई स्वीकृति हो, या बिना जाने हुई स्वीकृति हो। बिना जाने हुए होने वाली स्वीकृति को “मान्यता” या “आस्था” कहते हैं।
बिना जाने हुए मान लेना “आस्था” है।
जान कर मानना “विश्वास है।
जानने और मानने का तृप्ति बिन्दु अनुभव है। अनुभव ही जीने में प्रमाणित होता है।
जानने की तृप्ति सह-अस्तित्व नियम पूरी तरह समझ में आ जाने से होती है। यह अध्ययन पूर्वक ही हो सकता है। जाने हुए को मानना स्वाभाविक होता है। सह-अस्तित्व “नियम” के विरुद्ध मान्यताएं अस्वाभाविक होती हैं। जैसे – संघर्ष-वादी मान्यताएं अस्वाभाविक हैं। अस्वाभाविक मान्यताएं पीड़ा का कारण हैं। सह-अस्तित्व सहज मान्यताएं ही “जानने” में आ सकती हैं। सह-अस्तित्व सहज मान्यताओं को जानने का प्रयास ही अध्ययन है।
हम वास्तविकताओं को जीने में “पहचानते” हैं। किसी भी वस्तु को हम तभी पहचान पाते हैं जब उसके बारे में हम कुछ मानते या जानते हैं। जैसे – केले के वृक्ष को हम राह चलते तभी पहचान पायेंगे यदि हम उसके बारे में पहले से कुछ जानते-मानते हों। केले को पहचान लेने के बाद हम उसको वृक्ष से तोड़ कर जो खाने का क्रिया-कलाप करते हैं, उसको “निर्वाह करना” कहते हैं। उसी तरह हम अपने संबंधों को सटीक तभी पहचान पाते हैं, जब हम संबंधों के प्रयोजन के बारे में पहले से जानते-मानते हों। संबंधों को हम बिना जाने, केवल मानने के अनुसार पहचानने जाते हैं – तो संबंधों का ठीक से निर्वाह नहीं हो पाता, संबंधों में मूल्य प्रमाणित नहीं हो पाते। संबंधों में खोखला-पन का कारण यही है।
जीवन ही जानता-मानता है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में पहचानना-निर्वाह करना होता है। जानना – मानना – पहचानना – और निर्वाह करना, इनमें सामरस्यता अनुभव पूर्वक ही हो पाती है। यह सामरस्यता को स्वयं में पा जाना ही “समाधान” है।
स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन
आभार सहित- Madhyasth Darshan