स्वत्व, स्वतंत्रता, स्वराज्य “स्वत्व”, “स्वतंत्रता”, और “स्वराज्य” – ये तीन शब्द हम हमारे देश में बड़े समय से सुनते आए हैं। पर ये वास्तविकता में हैं क्या – यह समझ में किसी…
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स्वतन्त्रता “अनुभव दर्शन से
💢 स्वतन्त्रता “अनुभव दर्शन से” ◘ क्लेश ही दास्यता है। यह अजागृति का प्रतीक है। उससे मुक्ति ही स्वतंत्रता का लक्षण है।◘ स्वकर्म-परिपाक संस्कार अध्ययन एवं वातावरण ही स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के…
भाई-बहन संबंध
भाई-बहन संबंधः भाई-बहन संबंध को सौहार्द्र भाव के नाम से जाना जाता है। इस में परस्पर जागृति की प्रत्याशा एवं उत्साह है। एक की जागृति दूसरे पक्ष के जागृति को आप्लावित कर…
सुख
सुख••••• “मानव सुखी होना चाहता है। सुख के स्वरूप ज्ञान के लिए मैंने प्रयत्न किया। मानव का अध्ययन न हो और सुख पहचान में आ जाए – ऐसा हो नहीं सकता। दूसरे,…
तृप्ति के लिए उपाय
तृप्ति के लिए उपाय •••••••••••••••••••••सह-अस्तित्व के प्रस्ताव से सहमति होने से रोमांचकता तो होती है – पर उतने भर से तृप्ति नहीं है। तृप्ति के लिए क्या किया जाए? तृप्ति के लिए…
जीवन विद्या प्रवचन
॥ हरिहर ॥ भूमि : स्वर्गताम् यातु मनुष्यो यातु देवताम् धर्मो सफलताम् यातु नित्यम् यातु शुभोदयम् ॥ प्रणेता परम् श्रद्धेय श्री ए० नागराज जी द्वारा प्रतिपादित आस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन मध्यस्थ…
न्याय, धर्म, सत्य
न्याय, धर्म, सत्य •••••••••••••••••(समझ पूर्ण होने से पहले) न्याय, धर्म, सत्य के अनुसार तुलन करने के लिए वृत्ति में वस्तु नहीं है, शब्द है। शब्द है – तभी मनुष्य यह कह पाता…
छिद्रान्वेषण के स्थान पर सत्यान्वेषण
छिद्रान्वेषण के स्थान पर सत्यान्वेषण ••••••••••••••••••••••••••••••••मैं किसी से भी मिलता हूँ तो उससे मुझे कुछ न कुछ प्रेरणा तो मिलता ही है. किसी भी व्यक्ति से मिलना वृथा तो गया ही नहीं….
ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर
ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर •••••••••••••••••••••••••••••••ज्ञानगोचर और इन्द्रियगोचर के संयुक्त रूप में मानव की पहचान है। सह-अस्तित्व अपने में ज्ञानगोचर है। सह-अस्तित्व समझे बिना मानव अपने में ज्ञानगोचर पक्ष को पहचान ही नहीं सकता….
ज्ञान-दृष्टि
ज्ञान-दृष्टि ••••••••••••अन्तःकरण में इस बात की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए कि जीव-चेतना में जीते हुए मानव का सार्थक जीने का स्वरूप नहीं बनेगा. पहला मुद्दा यही है. यह निष्कर्ष यदि निकलता है…
बंधन का स्वरूप
बंधन का स्वरूप (१) भ्रम ही बंधन है। जीवन भ्रमित होता है। जीवन में भ्रम आशा, विचार, और इच्छा के स्तर पर होता है। भ्रम (आशा बंधन, विचार बंधन, इच्छा बंधन) का…
संग्रह का तृप्ति बिंदु …..
संग्रह का तृप्ति बिंदु किसी भी देश-काल में किसी एक व्यक्ति को भी नहीं मिल पाया। संसार का हर मानव “समृद्धि” चाहता है और वो आहार-आवास-अलंकार संबंधी वस्तुओं के आधार पर हो…
जिज्ञासा और समाधान
जिज्ञासा और समाधान ••••••••••••••••••••••••➡️प्रश्न: मानव व्यवहार दर्शन में अध्यायों का जो क्रम है, उस क्रम का निर्धारण आपने कैसे किया? उत्तर: जिस क्रम में मैंने अनुभव किया था, उस क्रम में प्रस्तुत…
मानव-चेतना
मानव-चेतना ••••••••••••••“मानव-चेतना” एक शब्द है। इस शब्द का अर्थ है – ज्ञान। ज्ञान रासायनिक-भौतिक वस्तु नहीं है। जड़-चैतन्य वस्तु सत्ता में संपृक्त है. सत्ता व्यापक वस्तु है, जिसमे भीगे रहने से जड़-प्रकृति…
उपसंहार
उपसंहार •••••••••मैंने जो सब प्रस्तुत किया है – चार भाग में दर्शन, तीन भाग में वाद, तीन भाग में शास्त्र, उसके साथ संविधान – उस पूरी बात का मतलब मैं बताना चाहता…
पठन से अध्ययन
पठन से अध्ययन ==========पढ़ना आ जाने या लिखना आ जाने मात्र से हम विद्वान नहीं हुए। समझ में आने पर या पारंगत होने पर ही अध्ययन हुआ। समझ में आने पर ही…
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Greetings everyone, Please find below the links for the discussed sources – Youtube Shivir Playlists – Parichay Shivir (Nikora – Som Tyagi) – https://youtube.com/playlist?list=PLqNLnOTQEJKYzKLyDhXd2Pt-HecyDeMjf Adhyan Bindu Shivir (Nikora – Som Tyagi) –…
कल्पनातीत उपलब्धि
कल्पनातीत उपलब्धि ••••••••••••••••••••••मैंने जो उपलब्धि पायी वह कल्पनातीत है. ऐसी कल्पना कोई कर नहीं पाया कि ऐसा कोई उपलब्धि होगा जिसमे सबके लिए जवाब होगा, जिसमे सबके लिए समाधान होगा, जिसमे सबके…
मानव की परिभाषा
मानव की परिभाषा मानव की परिभाषा है – मनाकार को साकार करने वाला, और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला। ➡️प्रश्न: “मनाकार को साकार करने” से क्या आशय है? क्या साकार करने…
तरण-तारण की सार्थकता
तरण-तारण की सार्थकता इस सौभाग्यशाली मुहूर्त में आप हम सब यहाँ (अमरकंटक में) उपस्थित हुए हैं। इस स्थान को युगों से हम मानव सर्वोपरि पवित्र-स्थल मान कर चले हैं। “यहाँ सभी प्रकार…
संवाद
संवाद •••••••➡️प्रश्न: “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” से क्या आशय है? उत्तर: “चेतना विकास” को छोड़ करके “मूल्य शिक्षा” होता नहीं है। इसीलिये “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” एक साथ कहा। आज…
वर्तमान शिक्षा प्रणाली
“वर्तमान शिक्षा प्रणाली” वर्तमान शिक्षा प्रणाली क्या उत्पन्न कर रही है? पढ़े – लिखे हुनरमंद (skilled) मजदूर ! चाहे वह इंजीनियर के नाम पर हो या मेडिकल के नाम पर।एक इंजीनियर को…
जीवन एक परमाणु
जीवन एक परमाणु ••••••••••••••••••••परमाणु व्यवस्था का मूल रूप है. कम से कम दो परमाणु-अंश मिल करके एक परमाणु को बनाते हैं. उसी तरह अनेक अंशों से मिल कर बने हुए भी परमाणु…
विकास(जागृति) के लिए किये गये व्यवहार……
विकास(जागृति) के लिए किये गये व्यवहार को पुरुषार्थ, निर्वाह के लिए किये गए व्यवहार को कर्तव्य तथा भोग के लिए किए गए व्यवहार को विवशता के नाम से जाना गया है।भोगरूपी आवश्यकताओं…
अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था
अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था •••••••••••••••••••••••••••••••••“मैं इस बात का सत्यापन करता हूँ कि संवेदनाओं के संयमित होने से पहले धरती पर एक भी व्यक्ति “अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था” को सोच नहीं…
मानव का कुल योजना और कार्यक्रम
मानव का कुल योजना और कार्यक्रम •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••सम्मान किसका करना है, यह अभी तक मानव जाति में तय नहीं हो पाया। लफंगाई का सम्मान हुआ है। तलवार का सम्मान हुआ है। जो चुपचाप…
संवाद की अंतिम बात
संवाद की अंतिम बात•••••••••••••••••••••••अभी हमारे इतने दिनों के सम्बन्ध में और संभाषण में जो आपको बोध होना था वह हुआ कि नहीं हुआ? -> मुझसे यह कहना नहीं बन पा रहा है,…
*प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?*
*प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?* प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना…
अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे
अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग-१ यह जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन सुखद, सुंदर, सौभाग्य-पूर्ण हो – यह मेरी शुभ कामना है। मूल में मुझे यह बताने के लिए कहा गया है की…
निराकार और साकार
निराकार और साकार साकार और निराकार की बहुत चर्चाएं हुई हैं. यह सम्माननीय तर्क भी है, विचार भी है. इसका समाधान भी उतना ही सम्मान करने योग्य है. अस्तित्व को यदि समझना…
संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन
संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन। अध्ययन के बाद रुकता नहीं है। आप-हमारे बीच में संदेश और सूचना हो गयी है – अब अध्ययन की बारी है। अध्ययन में हम…
ज्ञानगोचर वस्तु पहचानने की आवश्यकता
ज्ञानगोचर वस्तु पहचानने की आवश्यकता•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••ज्ञानगोचर सभी वस्तु पहचानने में आ जाए और प्रमाणित हो जाए – इसका नाम है अध्ययन. अनुभव की रोशनी में, स्मरण पूर्वक किये गए प्रयास को अध्ययन कहा….
शंका का समाधान
शंका का समाधान ••••••••••••••••••मुझसे रायपुर में शिक्षा से जुड़े १५० लोगों की एक बैठक में एक शंका व्यक्त किया गयी थी – “आपकी बात कहीं एक सम्प्रदाय तो नहीं बन जायेगी?” इसके…
बुद्धि-जीवियों के साथ परेशानी
बुद्धि-जीवियों के साथ परेशानी जीवन-ज्ञान और सह-अस्तित्व ज्ञान संपन्न होने पर हम “समझदार” हुए। समझदारी के साथ मानवीयता पूर्ण आचरण को जोड़ने से हम “ईमानदार” हुए। इस तरह ईमानदारी जोड़ने पर “जिम्मेदारी”…
इच्छा
इच्छा इन्द्रिय की परिभाषा है – इच्छा पूर्वक द्रवित होने वाला अंग. मानव जीवन में इच्छा होती है. इच्छा का स्वरूप ही है – ये चाहिए, ये नहीं चाहिए. इसी इच्छा के…
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरूप
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरूप ••••••••••••••••••••••••••••सत्ता किस वास्तविकता को व्यक्त करती है? सत्ता मध्यस्थ वस्तु है। वस्तु का मतलब है – जो वास्तविकताओं को व्यक्त करे। पारगामी, पारदर्शी, और व्यापक स्वरूप में सत्ता प्रस्तुत…
प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?
प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है? जानना अनुभव है. मानना संकल्प है। जानना पूरा ही होता है. जीने में प्रमाणित…
प्रभाव
प्रभाव •••••••सत्ता का प्रभाव सर्वत्र बना रहता है, सत्ता विकृत नहीं होता। उसी तरह प्रत्येक वस्तु का प्रभाव है। किसी वस्तु का प्रभाव जितनी दूर तक है, उससे वह वस्तु विकृत नहीं…
जीवन विद्या परिचय शिविर 2024
जीवन विद्या परिचय शिविर मानव में परिवार समाज व्यवस्था, मूल्य चरित्र नीति, व्यवसाय समाज प्रकृति, कार्य व्यवहार विचार अनुभव, जड़ चैतन्य व्यापक, भौतिक रासायनिक व चैतन्य क्रिया, न्याय धर्म सत्य का अर्थ…
साधना का फल
साधना का फल साधना करने वालों का संसार ने सम्मान किया है. साधना का फल किन्तु संसार को नहीं मिला. साधना करने वाले को साधना से कुछ मिला या नहीं मिला यह…