समझ और आचरण मानव-चेतना संबंधी ज्ञान हमको समझ में आए और आचरण में नहीं आए ऐसा हो नहीं सकता। हम समझदार हो और भीख मांग कर खाएँ, ऐसा हो नहीं सकता। हम…
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योग यानी मिलन
योग यानी मिलन स्वयं का स्वयं के साथ मिलन भी एक योग है. शारिरीक व्यवस्था/शारिरीक स्वास्थ्य के अर्थ में शरीर के साथ संयमपूर्वक, मिलजुलकर रहना भी एक योग है. पारिवारिक व्यवस्था/पारिवारिक स्वास्थ्य…
मानव समुदाय चेतना का एक इतिहास
मानव समुदाय चेतना का एक इतिहास ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••“…उक्त प्रकार से आदि मानव ने एक स्थान अथवा देश में शरीर यात्रा प्रांरभ किया, या एक से अधिक देश अथवा स्थान में आरंभ किया –…
हर व्यक्ति समझदार होने योग्य है।
मनुष्य जाति में आज तक शुभ से जीने की अपेक्षा तो रही, पर शुभ का मॉडल नहीं रहा। अब वह मॉडल आ गया है। स्वयं तृप्त होने के बाद उसको प्रमाणित करने…
पूर्णता के अर्थ में वेदना
पूर्णता के अर्थ में वेदना ••••••••••••••••••••••••जीव-चेतना में मानव शरीर को जीवन मानता है। जीवन अपनी आवश्यकताओं को शरीर से पूरा करने की कोशिश करता है, जो पूरा होता नहीं है, इसलिए अतृप्त…
मानव तीर्थ में कार्तिक पूर्णिमा, को *’कृतज्ञता दिवस’* मनाया गया।
नमस्ते,मानव तीर्थ में 27 नवंबर 2023, कार्तिक पूर्णिमा, को *’कृतज्ञता दिवस’* मनाया गया। कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट संलग्न है।
नैसर्गिकता का नित्य वैभव
नैसर्गिकता का नित्य वैभव “भाव ही धर्म है| भाव मौलिकता है| धर्म का व्यवहार रूप ही न्याय है| धर्म स्वयं परस्पर पूरकता के अर्थ में स्पष्ट है| परस्परता सम्पूर्ण अस्तित्व में स्पष्ट…
पृथ्वी गंधवती है.
पृथ्वी गंधवती है. “पृथ्वी गंधवती है” – वैदिक-विचार में भी इस बात को कहा है। सुगंध और दुर्गन्ध दोनों प्राण-अवस्था से स्पष्ट हुई। जीवों में गंध के आधार पर अपने आहार को…
अस्तित्व का स्वरूप
अस्तित्व का स्वरूप •••••••••••••••••••••समाधि-संयम पूर्वक अस्तित्व का स्वरूप मुझे समझ में आया। अभी तक अस्तित्व के बारे में जो ब्रह्मवादी कहते रहे हैं – वैसा नहीं है अस्तित्व! ब्रह्मवादियों का कहना है…
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व – भाग १••••••••••••••••••••••••••••••••••••••➡️प्रश्न: “मूल तत्व” से क्या आशय है? “तत्व” से आशय है – सत्य। “ मूल तत्व” का मतलब है – मूल में सत्य क्या है,…
प्रत्यक्ष और प्रमाण
प्रत्यक्ष और प्रमाण••••••••••••••••••••प्रमाण का स्वरूप है – अनुभव प्रमाण, व्यवहार प्रमाण, प्रयोग प्रमाण अनुभव में यदि सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होता है तो अनुभव-प्रमाण है – अन्यथा…
घटनाएं मानव के लिये प्रमाणित एवं प्रामाणिक होने के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं।
“घटनाएं मानव के लिये प्रमाणित एवं प्रामाणिक होने के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। प्रामाणिकता अनुभव है। प्रमाण शिक्षा है। प्रत्येक दुर्घटना में भी एक सद्घटना की कल्पना, कामना, आकाँक्षा एवं आवश्यकता का मानव…
समाधान के बिना समृद्धि का कल्पना भी नहीं किया जा सकता
समाधान के बिना समृद्धि का कल्पना भी नहीं किया जा सकता मध्यस्थ-दर्शन ने मानव-लक्ष्य को समाधान, समृद्धि, अभय, और सह-अस्तित्व के रूप में पहचाना है। हर मानव का यही लक्ष्य है। समाधान…
प्रश्न: कृपया परिवार के महत्त्व को समझाइये.
प्रश्न: कृपया परिवार के महत्त्व को समझाइये. उत्तर: परिवार संबंधों में जीने का स्वरूप है. संबंधों के नाम आपको विदित हैं. इन संबंधों का प्रयोजन समझ में आता है तो उनका निर्वाह…
बोलना कोई जीना नहीं है…..
बोलना कोई जीना नहीं है. जीने में समाधान ही होगा, समृद्धि ही होगा – और इसके अलावा कुछ भी नहीं होगा. बोलना एक ‘सूचना’ है. ‘जीना’ प्रमाण है. जीने में समाधान-समृद्धि ही…
समझदारी का प्रमाण
समझदारी का प्रमाण किसी आयु के बाद हर व्यक्ति अपने आप को समझदार माना ही रहता है। हर मनुष्य अपने ढंग से अपने को समझदार मानता है। जैसे कोई कहता है –…
देखने से, धर्म की…..
देखने से, धर्म की सउर देखने से पता लगता है अपराधियों के लिए ही ये सब बना हुआ है..धर्म तंत्र और राजतंत्र|क्योंकि अपराधियों को तारने वाला भी एक गुण तो मानव परंपरा…
इन्द्रिय सन्निकर्ष में ही ‘अनुभव होता है…….
“इन्द्रिय सन्निकर्ष में ही ‘अनुभव होता है’ ऐसा मानना और मनवाना, इसको लोकव्यापीकरण करने का सभी उपाय तैयार करना, साथ ही लाभोन्माद, कामोन्माद और भोगोन्मादी मानसिकता को कार्यशील, प्रगतिशील, विकासशील और अत्याधुनिक…
कल्पनाशीलता के आधार पर जिज्ञासा है।
कल्पनाशीलता के आधार पर जिज्ञासा है। जिज्ञासा ही पात्रता है। जिज्ञासा की प्राथमिकता के आधार पर ही ग्रहण होता है। जिज्ञासा की प्राथमिकता है या नहीं – इसको सटीक पहचानना अध्यापक का…
जीवन विद्या सार
जीवन विद्या सार सह-अस्तित्व सहज नियमों का जो मूल नियम है वो है, संपूर्ण द्रश्य-अद्रश्य/रुप-अरुप/भौतिक-अभौतिक/स्थूल-सूक्ष्म अस्तित्वसह-अस्तित्व के रुप में है, इसलिए हरपल-हरक्षण सह-अस्तित्व के द्रष्टिकोण के साथ जीना ही सह-अस्तित्व सहज मूल…
नियति विधि से नियम है
नियति विधि से नियम है नीति “नियति” से सम्बंधित है। नियति का अर्थ है – सह-अस्तित्व। सह-अस्तित्व नित्य प्रगटन-शील है। यही नियति है। साम्य-सत्ता में सम्पूर्ण जड़-चैतन्य प्रकृति क्रियाशील है। भौतिक-क्रिया, रासायनिक-क्रिया,…
आँखों से जो कुछ भी दिखता है वह किसी…..
“आँखों से जो कुछ भी दिखता है वह किसी वस्तु के रूप (आकार, आयतन, घन) में से आंशिक भाग दिखाई पड़ता है। रूप का भी सम्पूर्ण भाग आँखों में आता नहीं। जबकि…
सार्वभौम व्यवस्था
सार्वभौम व्यवस्था – सम्मलेन २००९, हैदराबाद==============>जय हो! मंगल हो! कल्याण हो! इस शुभ-कामना से हम यहाँ मिले हैं। आज मेरे वक्तव्य का मुद्दा है – “सार्वभौम व्यवस्था”। सार्वभौम व्यवस्था कैसे होती है?…
प्रश्न – मुक्ति
प्रश्न मुक्ति •••••••••••••७०० करोड़ मानवों के सभी प्रश्नों के लिए एक ही चाबी है। समझना है और प्रमाणित करना है – तो सभी प्रश्न ही समाप्त हैं। समझना नहीं है, प्रमाणित नहीं…
स्त्रोत की ओर ध्यानाकर्षण
स्त्रोत की ओर ध्यानाकर्षण जीवन विद्या योजना इस अनुसंधान की “सूचना” को जनसामान्य तक पहुंचाने का एक कार्यक्रम है. उससे लोगों में उत्साह होता है. उत्साहित लोगों को अध्ययन में लगाना चाहिए….
ऊर्जा
ऊर्जा•••••सभी संसार – एक परमाणु-अंश से लेकर परमाणु तक, परमाणु से लेकर अणु रचित रचना तक, अणु रचित रचना से लेकर प्राण-कोषा से रचित रचना तक – का क्रियाकलाप स्वयं-स्फूर्त होता हुआ…
तर्क का प्रयोजन
तर्क का प्रयोजन प्रश्न: तर्क क्या है? तर्क का प्रयोजन क्या है? उत्तर: तर्क का मतलब है क्यों और कैसे का उत्तर दे पाना । ऐसा तर्क एक प्रेरणा है । तर्क…
बुद्धि के साथ “विवेक” पूर्वक हम सुखी होते हैं.
बुद्धि के साथ “विवेक” पूर्वक हम सुखी होते हैं. ============================= बुद्धि के साथ सुखी होने की विधि है – विवेक। अविवेक पूर्वक हम दुखी होते हैं। विवेक के बारे हमें विगत में…
तन की प्यास पानी से बुझती है और मन(जीवन) की
तन की प्यास पानी से बुझती है और मन(जीवन) की प्यास अस्तित्वसहज वस्तुओं(वास्तविकताओं) में तदाकार होने पर ही बुझती है।तदाकार होने की स्थिति केवल अध्ययन से आता है। तदाकार से आशय है…
मानसिकता
मानसिकता••••••••••••••➡️ मानव परंपरा में यह विदित है कि मानव क्रियाकलाप के मूल में मानसिकता का रहना अत्यावश्यक है । मानसिकता विहीन मानव को मृतक या बेहोश घोषित किया जाता है । विकृत…
मानव जाति, मानव धर्म
मानव जाति, मानव धर्म मानव धर्म के बारे में, तीन आशय समाहित हैं| विकसित चेतना में जीता हुआ मानव, देव मानव, दिव्य मानव का अध्ययन है | चेतना के सन्दर्भ में चार…
न्याय दृष्टि जीवन में रहता ही है, पर जागृत नहीं हुआ रहता है
न्याय दृष्टि जीवन में रहता ही है, पर जागृत नहीं हुआ रहता है•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• न्याय चाहिए, पर प्रिय-हित-लाभ के चंगुल से छुटे नहीं हैं. अभी हम न्याय को भी संवेदनाओं के साथ जोड़ते…
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरुप
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरुप मध्यस्थ-क्रिया वह है – जो सम और विषम से अप्रभावित रहता है, और सम और विषम क्रियाओं को संतुलित बना कर रखता है। इसके दो स्वरुप हैं। (१) परमाणु…
होना और रहना
होना और रहना “होना” अस्तित्व में प्रकटन विधि से है। अस्तित्व प्रयोजनशील है – इसलिए इसमें उत्ततोत्तर विकास-क्रम और जागृति-क्रम का क्रमिक-प्रकटन भावी है। इसी क्रम में – पदार्थावस्था समृद्ध होने पर…
जागृत मानव के अनुभव की वस्तु
जागृत मानव के अनुभव की वस्तु “जागृत मानव (दृष्टा पद) = “Awakened Human Being (The Seer) has: – Information Source–
परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था
परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था दस व्यक्तियों के समझदार परिवार में समाधान-समृद्धि का वैभव होता है। ऐसे दस समझदार परिवार एक-एक व्यक्ति को अपने में से निर्वाचित करते हैं, जो परिवार-समूह सभा को…
मध्यस्थ दर्शन सूत्र
नमस्ते जी जब संबंध नहीं है तो पैसा एकमात्र शरण है। जो चीज जिस काम के लिए बनी है उस चीज को उस काम के लिए उपयोग करना ही उसकी उपयोगिता है।…
परस्पर पहचान होना प्रकाशन का मतलब है.
परस्पर पहचान होना प्रकाशन का मतलब है. हर वस्तु के सभी ओर उसका प्रतिबिम्ब रहता है। क्योंकि हर वस्तु सीमित होता है। सीमित होने के आधार पर ही “एक” के रूप में…
समझने की प्रक्रिया
समझने की प्रक्रिया (1) समझना वस्तु है, शब्द नहीं है। अंततोगत्वा शब्दों से इंगित वस्तु को पहचानना है, या शब्द को पहचानना है? यह तय करना होगा। शब्दों को शब्दों से जोड़ते…
समझदारी से सोचा जाए!
समझदारी से सोचा जाए! संसार में मानव परंपरा है. मानव परंपरा ज्ञान-अवस्था में है. इसके प्रमाण में मानव ने अपना भाषा विकसित किया. भाषा को ज्ञान के स्वरूप में ही माना. इस…