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Category: Jeevan Vidya blog

Jeevan Vidya blog

संबंध

Posted on November 9, 2023

संबंध “संबंध” की परिभाषा है – पूर्णता के अर्थ में अनुबंध(प्रतिज्ञा)। पूर्णता का मतलब है, – क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता. क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता व्यवस्था के रुप में ही प्रमाणित होता है. इस तरह…

अर्थ को समझना हर व्यक्ति के बलबूते का है।

Posted on November 8, 2023

अर्थ को समझना हर व्यक्ति के बलबूते का है। जीवन में स्वयं से कोई चीज छुपा नहीं है। शरीर को जब तक जीवन माने रहते हैं, जीवन छुपा ही रहता है। जीवन…

प्रमाण

Posted on November 8, 2023

शास्त्र को सर्वोपरि प्रमाण मानने तक पहुंचा है – मानव को प्रमाण नहीं माना। यही मुख्य बात है. सह-अस्तित्व वादी विधि से शिक्षा व्यवस्था में जीने के अर्थ में है। स्थिरता और…

संपृक्तता, क्रियाशीलता, प्रगटन-शीलता

Posted on November 8, 2023

संपृक्तता, क्रियाशीलता, प्रगटन-शीलता~~~~ हर परस्परता के बीच जो रिक्त-स्थली है, वही व्यापक-वस्तु है। इकाइयों के बीच अच्छी दूरी होने का प्रयोजन है – एक दूसरे की पहचान होना। पहचानने का प्रयोजन है…

सहज और कृत्रिम

Posted on November 8, 2023

सहज और कृत्रिम प्रश्न: “सहज” शब्द से क्या आशय है? उत्तर: सहज से आशय है – मानव को जिसे बनाना नहीं है. सभी व्यवस्था सहज है. नियम सहज है. जीवन सहज है….

आहार-विहार-व्यवहार

Posted on November 4, 2023

आहार-विहार-व्यवहार आहार-विहार-व्यवहार द्वारा मानव अपनी स्वस्थ-मानसिकता का प्रदर्शन करता है|आहार से आशय है – खान-पान, जैसे – शाकाहार-दुग्धपान या माँसाहार-मद्यपान.विहार से आशय है – रहन-सहन, जैसे – ओढ़ना-पहनना, मनोरंजन, व्यायाम, खेल-कूद, घूमना…

क्रिया के प्रकार क्या है ?

Posted on October 29, 2023

1) क्रिया के प्रकार क्या है ? प्रकृति क्रिया स्वरूप है। क्रिया का मूल स्वरूप परमाणु है। भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया – ये तीन प्रकार की क्रिया होती है। सारी…

प्रचार-माध्यमों की सार्थकता

Posted on October 25, 2023

प्रचार-माध्यमों की सार्थकता आज सभी प्रचार-माध्यम अपराध-गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया करता है। प्रचार-माध्यम का मूल स्वरूप सही-गलती को चेताने से है, अथवा स्पष्ट करने से है। इसमें से “गलती”…

जीवन विद्या

Posted on October 24, 2023

जीवन विद्या मध्यस्थ दर्शन ( सहअस्तित्ववाद) मैं जीवन एवं शरीर के संयुक्त रूप में मानव हुँ। (भ्रम मुक्ति) जीवन में मैं आत्मा (मध्यांश) हूँ मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि मेरा है। (गठनपूर्णता) मुझे…

जड़ और चैतन्य

Posted on October 20, 2023

जड़ और चैतन्य~~जड़-प्रकृति और चैतन्य-प्रकृति दोनों गतिशील/क्रियाशील हैं – लेकिन दोनों की मौलिकताएं अलग-अलग हैं। चैतन्य-प्रकृति में परावर्तन और प्रत्यावर्तन दोनों हैं, जबकि जड़ प्रकृति में केवल परावर्तन है। परावर्तन का मतलब…

पारिवारिक खुशहाली शिविर

Posted on October 19, 2023

घोषणा छुट्टियां खुशी के पल होते हैंपर क्या हमें यह पता है कि खुशी क्या होती है?आइए इस ठंडी की छुट्टियां इसके ही अन्वेषण (Exploration) में लगायेंपारिवारिक खुशहाली शिविर(Family Happiness Workshop)स्रोत: मध्यस्थ…

ज्ञान

Posted on October 19, 2023

ज्ञान मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है। भ्रमित रहते तक ऊर्जा का प्रयोग मनुष्य चार विषयों और पांच संवेदनाओं के रूप में करता है। जागृत होने पर ऊर्जा का प्रयोग…

Jeevan Vidya A Workshop on Coexistence

Posted on October 18, 2023

Jeevan Vidya: A dialogue based exploration of Coexistence:10 Day Introductory Workshop in English.Location: Dharwad, Karnataka (Near Hubli)Dates: 24th December 2023 – 02 January 2024Faciliator: Shriram Narasimhan.REGISTER: https://bit.ly/jvengTOPICS• Mind & Reality More Info…

मूल्यों की समझ

Posted on October 17, 2023

मूल्यों की समझ “अस्तित्व में परस्परता में सम्बन्ध हैं ही| अस्तित्व में हर वस्तु प्रयोजन सहित ही है| सम्बन्ध को उनके प्रयोजन को पहचान कर निर्वाह करते हैं तो उनमे निहित मूल्यों…

समझना और कार्य-करना

Posted on October 16, 2023

समझना और कार्य-करना शब्द के अर्थ को मानव ही समझता है। मानव ही अपनी समझ के अनुसार कार्य करता है। समझना” और “कार्य करना” ये दो भाग हैं। “कार्य करने” के पक्ष…

संस्कार और प्रारब्ध

Posted on October 15, 2023

संस्कार और प्रारब्ध°°°°°°°°°°°°°°°°°° ➡️ संस्कार क्या है? मानव जाति में अभी संस्कार का क्या स्वरूप है? मानव जाति में अभी तक संस्कार बना ही नहीं है. संस्कार अभी भाषा रूप में है….

अमूर्त और मूर्त

Posted on October 14, 2023

अमूर्त और मूर्त मनुष्य-शरीर को जीवन चलाता है। ऐसे मनुष्य-शरीर को चलाते हुए जीवन ‘अमूर्त’ वस्तुओं की अपेक्षा में जीता है। सुख एक अमूर्त वस्तु है। सुख को मूर्त वस्तुओं (भौतिक-रासायनिक) में…

मानव सहज-अपेक्षा स्वतन्त्र रहने की है.

Posted on October 14, 2023

मानव सहज-अपेक्षा स्वतन्त्र रहने की है. मानव-परम्परा में जो कुछ भी भौतिक वस्तुओं की “प्राप्तियां” हुई वे “सुखी होने” के लिए प्रयत्न करने के क्रम में ही हुई। वस्तुओं से “सुखी” होने…

निरन्तर शुभोदय का उदय

Posted on October 13, 2023

“अमानवीय मानव कितना भी रूपवान, बलवान, धनवान एवं पदवान हो जाय, वह अजागृत के जागृति के लिए सहयोगी नहीं हो पाता है। इसके विपरीत में मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण मानव कितना भी…

ज्ञान और प्रमाण

Posted on October 13, 2023

ज्ञान और प्रमाण जितना हमें ज्ञान होता है वह पूरा प्रमाणित होता ही नहीं. जैसे – समुद्र की एक बूँद का परीक्षण करके हम प्रमाणित करते हैं. समुद्र का सारा पानी वैसा…

अभी तक की सोच का विकल्प

Posted on October 12, 2023

अभी तक की सोच का विकल्प मनुष्य-जाति के इतिहास में अभी तक जो भी प्रयास हुए, वे उसको समझदारी के घाट पर पहुंचाने में असमर्थ रहे। पहले आदर्शवाद ने “आस्था” या मान्यता…

सत्य – ज्ञान – प्रमाण भाग – २

Posted on October 10, 2023

सत्य – ज्ञान – प्रमाण भाग – २ समझदारी से ही समाधान होना प्रमाणित होता है। नासमझी से ही सारी समस्याएं होती हैं। जो समझदार होते नहीं है पर स्वयं को समझदार…

न्याय और व्याख्या

Posted on October 7, 2023

न्याय और व्याख्या न्याय का स्वरूप मानव-संबंधों में स्पष्ट होता है। मानव द्वारा अपनी परस्परता में संबंधों को पहचानना एक साधारण प्रक्रिया है। “पिता”, “माता”, “भाई”, “बहन” ये नाम से परस्परता में…

धर्म और व्याख्या

Posted on October 7, 2023

धर्म और व्याख्या “धर्म” शब्द एक वेद-कालीन या बहुत प्राचीन-कालीन उपलब्धि है। प्राचीन काल से “धर्म” शब्द का प्रयोग होता आया है। विविध प्रकार से धर्म-गद्दियाँ स्थापित हुई। इस धरती पर जितनी…

स्वत्व समझ ही है.

Posted on October 6, 2023

स्वत्व समझ ही है. हर मनुष्य में “स्वत्व” समझदारी के रूप में समीचीन है। समझदारी या तो प्रमाण के रूप में आ गया है, या फ़िर समीचीन है। समीचीन का मतलब निकटवर्ती…

दासत्व से मुक्ति

Posted on October 6, 2023

दासत्व से मुक्ति दासत्व से मुक्ति स्वावलंबन से आता है. स्वावलंबन समाधान से आता है. स्वावलंबन की चर्चा कब से हो रही है – पर क्या स्वावलंबन हो पाया? अभी कुछ भी…

पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर प्रभाव

Posted on October 6, 2023

पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर प्रभाव प्रश्न: पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर: पिछली शरीर यात्रा में जो पराभव से त्रस्त रहे,…

व्यवस्था का मूल स्वरूप

Posted on October 2, 2023

व्यवस्था का मूल स्वरूप~~~परमाणु-अंश में आचरण निश्चित नहीं होता। किसी गठन से पृथक होने पर परमाणु-अंश किसी एक तरह का आचरण नहीं करता, उसका आचरण बदलता रहता है। गठन से पृथक परमाणु-अंश…

सम्बन्ध और जीवन

Posted on September 29, 2023

सम्बन्ध और जीवन मानव को इन्द्रियों से कुछ ज्ञानार्जन होता है, और कुछ ज्ञानार्जन उसको समझने से होता है. जो ज्ञानार्जन होता है, उसको वह क्रियान्वित करता है. शब्द, स्पर्श, रूप, रस,…

समाधान-समृद्धि का अनुकरण

Posted on September 28, 2023

समाधान-समृद्धि का अनुकरण स्वयं में विश्वास नहीं है तो दूसरे पर विश्वास करना सम्भव नहीं है। आज के प्रचलित तरीके से जीने से आदमी अहमता के आधार पर अकेला हो गया है,…

ज्ञान और प्रक्रिया

Posted on September 28, 2023

ज्ञान और प्रक्रिया~~~मनुष्य को जो समझ में आता है – वही ज्ञान है। ज्ञान के चार स्तर हैं – जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। ज्ञान जीवन-संतुष्टि की वस्तु है। चार विषयों का…

ईश्वर और मुक्ति

Posted on September 27, 2023

ईश्वर और मुक्ति ईश्वर को मैंने व्यापक स्वरूप में देखा। उसी को “परमात्मा” नाम दिया जा सकता है – यदि इच्छा हो तो! ऐसे “व्यापक वस्तु में संपृक्त प्रकृति” के रूप में…

समाज

Posted on September 26, 2023

समाज “संबंधों का ताना-बाना ही समाज है| सम्पूर्ण सम्बन्ध संस्कृति, सभ्यता, विधि और व्यवस्था वादी हैं| समाज के यही चार आयाम हैं| इसकी सार्वभौमता ही इनका वैभव है| समाज की पूर्णता साम्प्रदायिक…

ज्ञानार्जन के बाद कार्यक्रम

Posted on September 26, 2023

ज्ञानार्जन के बाद कार्यक्रम ज्ञानार्जन करने में सभी स्वतन्त्र हैं। ज्ञानार्जन करने के बाद शुभ-कार्य में प्रवृत्त होना, प्रमाणित होना – यह वेतन-भोगिता के साथ संभव नहीं है। वेतन-भोगिता विधि से आदमी…

अमीरी और गरीबी में असंतुलन मानव-जाति की छाती के पीपल

Posted on September 21, 2023

अमीरी और गरीबी में असंतुलन मानव-जाति की छाती के पीपल ============================>आदि-काल से अभी तक हर समुदाय में नर-नारियों में असमानता – ऊपर-नीचे की बात, श्रेष्ठ और नेष्ट की बात, ज्यादा और कम…

जीने दो, जियो

Posted on August 22, 2023

जीने दो, जियो =========== मानव को चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित रहने के लिए आवश्यक नियम है – “जीने दो, जियो”। ज्ञान-अवस्था (मनुष्य) के साथ सम्बन्ध में “जीने देने” का मतलब है…

ज्ञान

Posted on May 30, 2023

*ज्ञान* ==== ज्ञान होना आवश्यक है – यह सबको पता है। ज्ञान क्या है? – यह पता नहीं है। मध्यस्थ-दर्शन के अनुसन्धान से निकला – ज्ञान मूलतः तीन स्वरूप में है। सह-अस्तित्व…

सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग

Posted on May 30, 2023

*सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग १ *===================== आदिकाल से, जबसे ईश्वर और ईश्वरीयता की चर्चा वांग्मय में (अर्थात लेख रूप में) अथवा मुखस्थ विधि से परम्परा के रूप में आरम्भ…

अनुभव ज्ञान

Posted on May 30, 2023

अनुभव ज्ञान https://youtu.be/qa7b5bMsvOo आपने “अनुभव ज्ञान” शीर्ष में लिखा है: “सत्ता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति, सत्ता (व्यापक) में संपृक्त जड़ चैतन्य इकाइयां अनंत व्यापक (पारगामी व पारदर्शी) सत्ता में संपृक्त सभी…

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“भूमि स्वर्गताम यातु
मनुष्य यातु देवताम्:
धर्मो सफलताम यातु
नित्यं यातु शुभोदयम्I “

-A.Nagraj, Propounder- Madhyasth Darshan

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