संबंध “संबंध” की परिभाषा है – पूर्णता के अर्थ में अनुबंध(प्रतिज्ञा)। पूर्णता का मतलब है, – क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता. क्रिया-पूर्णता और आचरण-पूर्णता व्यवस्था के रुप में ही प्रमाणित होता है. इस तरह…
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अर्थ को समझना हर व्यक्ति के बलबूते का है।
अर्थ को समझना हर व्यक्ति के बलबूते का है। जीवन में स्वयं से कोई चीज छुपा नहीं है। शरीर को जब तक जीवन माने रहते हैं, जीवन छुपा ही रहता है। जीवन…
प्रमाण
शास्त्र को सर्वोपरि प्रमाण मानने तक पहुंचा है – मानव को प्रमाण नहीं माना। यही मुख्य बात है. सह-अस्तित्व वादी विधि से शिक्षा व्यवस्था में जीने के अर्थ में है। स्थिरता और…
संपृक्तता, क्रियाशीलता, प्रगटन-शीलता
संपृक्तता, क्रियाशीलता, प्रगटन-शीलता~~~~ हर परस्परता के बीच जो रिक्त-स्थली है, वही व्यापक-वस्तु है। इकाइयों के बीच अच्छी दूरी होने का प्रयोजन है – एक दूसरे की पहचान होना। पहचानने का प्रयोजन है…
सहज और कृत्रिम
सहज और कृत्रिम प्रश्न: “सहज” शब्द से क्या आशय है? उत्तर: सहज से आशय है – मानव को जिसे बनाना नहीं है. सभी व्यवस्था सहज है. नियम सहज है. जीवन सहज है….
आहार-विहार-व्यवहार
आहार-विहार-व्यवहार आहार-विहार-व्यवहार द्वारा मानव अपनी स्वस्थ-मानसिकता का प्रदर्शन करता है|आहार से आशय है – खान-पान, जैसे – शाकाहार-दुग्धपान या माँसाहार-मद्यपान.विहार से आशय है – रहन-सहन, जैसे – ओढ़ना-पहनना, मनोरंजन, व्यायाम, खेल-कूद, घूमना…
क्रिया के प्रकार क्या है ?
1) क्रिया के प्रकार क्या है ? प्रकृति क्रिया स्वरूप है। क्रिया का मूल स्वरूप परमाणु है। भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया – ये तीन प्रकार की क्रिया होती है। सारी…
प्रचार-माध्यमों की सार्थकता
प्रचार-माध्यमों की सार्थकता आज सभी प्रचार-माध्यम अपराध-गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया करता है। प्रचार-माध्यम का मूल स्वरूप सही-गलती को चेताने से है, अथवा स्पष्ट करने से है। इसमें से “गलती”…
जीवन विद्या
जीवन विद्या मध्यस्थ दर्शन ( सहअस्तित्ववाद) मैं जीवन एवं शरीर के संयुक्त रूप में मानव हुँ। (भ्रम मुक्ति) जीवन में मैं आत्मा (मध्यांश) हूँ मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि मेरा है। (गठनपूर्णता) मुझे…
जड़ और चैतन्य
जड़ और चैतन्य~~जड़-प्रकृति और चैतन्य-प्रकृति दोनों गतिशील/क्रियाशील हैं – लेकिन दोनों की मौलिकताएं अलग-अलग हैं। चैतन्य-प्रकृति में परावर्तन और प्रत्यावर्तन दोनों हैं, जबकि जड़ प्रकृति में केवल परावर्तन है। परावर्तन का मतलब…
पारिवारिक खुशहाली शिविर
घोषणा छुट्टियां खुशी के पल होते हैंपर क्या हमें यह पता है कि खुशी क्या होती है?आइए इस ठंडी की छुट्टियां इसके ही अन्वेषण (Exploration) में लगायेंपारिवारिक खुशहाली शिविर(Family Happiness Workshop)स्रोत: मध्यस्थ…
ज्ञान
ज्ञान मानव में ऊर्जा-सम्पन्नता ज्ञान के रूप में है। भ्रमित रहते तक ऊर्जा का प्रयोग मनुष्य चार विषयों और पांच संवेदनाओं के रूप में करता है। जागृत होने पर ऊर्जा का प्रयोग…
Jeevan Vidya A Workshop on Coexistence
Jeevan Vidya: A dialogue based exploration of Coexistence:10 Day Introductory Workshop in English.Location: Dharwad, Karnataka (Near Hubli)Dates: 24th December 2023 – 02 January 2024Faciliator: Shriram Narasimhan.REGISTER: https://bit.ly/jvengTOPICS• Mind & Reality More Info…
मूल्यों की समझ
मूल्यों की समझ “अस्तित्व में परस्परता में सम्बन्ध हैं ही| अस्तित्व में हर वस्तु प्रयोजन सहित ही है| सम्बन्ध को उनके प्रयोजन को पहचान कर निर्वाह करते हैं तो उनमे निहित मूल्यों…
समझना और कार्य-करना
समझना और कार्य-करना शब्द के अर्थ को मानव ही समझता है। मानव ही अपनी समझ के अनुसार कार्य करता है। समझना” और “कार्य करना” ये दो भाग हैं। “कार्य करने” के पक्ष…
संस्कार और प्रारब्ध
संस्कार और प्रारब्ध°°°°°°°°°°°°°°°°°° ➡️ संस्कार क्या है? मानव जाति में अभी संस्कार का क्या स्वरूप है? मानव जाति में अभी तक संस्कार बना ही नहीं है. संस्कार अभी भाषा रूप में है….
अमूर्त और मूर्त
अमूर्त और मूर्त मनुष्य-शरीर को जीवन चलाता है। ऐसे मनुष्य-शरीर को चलाते हुए जीवन ‘अमूर्त’ वस्तुओं की अपेक्षा में जीता है। सुख एक अमूर्त वस्तु है। सुख को मूर्त वस्तुओं (भौतिक-रासायनिक) में…
मानव सहज-अपेक्षा स्वतन्त्र रहने की है.
मानव सहज-अपेक्षा स्वतन्त्र रहने की है. मानव-परम्परा में जो कुछ भी भौतिक वस्तुओं की “प्राप्तियां” हुई वे “सुखी होने” के लिए प्रयत्न करने के क्रम में ही हुई। वस्तुओं से “सुखी” होने…
निरन्तर शुभोदय का उदय
“अमानवीय मानव कितना भी रूपवान, बलवान, धनवान एवं पदवान हो जाय, वह अजागृत के जागृति के लिए सहयोगी नहीं हो पाता है। इसके विपरीत में मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण मानव कितना भी…
ज्ञान और प्रमाण
ज्ञान और प्रमाण जितना हमें ज्ञान होता है वह पूरा प्रमाणित होता ही नहीं. जैसे – समुद्र की एक बूँद का परीक्षण करके हम प्रमाणित करते हैं. समुद्र का सारा पानी वैसा…
अभी तक की सोच का विकल्प
अभी तक की सोच का विकल्प मनुष्य-जाति के इतिहास में अभी तक जो भी प्रयास हुए, वे उसको समझदारी के घाट पर पहुंचाने में असमर्थ रहे। पहले आदर्शवाद ने “आस्था” या मान्यता…
सत्य – ज्ञान – प्रमाण भाग – २
सत्य – ज्ञान – प्रमाण भाग – २ समझदारी से ही समाधान होना प्रमाणित होता है। नासमझी से ही सारी समस्याएं होती हैं। जो समझदार होते नहीं है पर स्वयं को समझदार…
न्याय और व्याख्या
न्याय और व्याख्या न्याय का स्वरूप मानव-संबंधों में स्पष्ट होता है। मानव द्वारा अपनी परस्परता में संबंधों को पहचानना एक साधारण प्रक्रिया है। “पिता”, “माता”, “भाई”, “बहन” ये नाम से परस्परता में…
धर्म और व्याख्या
धर्म और व्याख्या “धर्म” शब्द एक वेद-कालीन या बहुत प्राचीन-कालीन उपलब्धि है। प्राचीन काल से “धर्म” शब्द का प्रयोग होता आया है। विविध प्रकार से धर्म-गद्दियाँ स्थापित हुई। इस धरती पर जितनी…
स्वत्व समझ ही है.
स्वत्व समझ ही है. हर मनुष्य में “स्वत्व” समझदारी के रूप में समीचीन है। समझदारी या तो प्रमाण के रूप में आ गया है, या फ़िर समीचीन है। समीचीन का मतलब निकटवर्ती…
दासत्व से मुक्ति
दासत्व से मुक्ति दासत्व से मुक्ति स्वावलंबन से आता है. स्वावलंबन समाधान से आता है. स्वावलंबन की चर्चा कब से हो रही है – पर क्या स्वावलंबन हो पाया? अभी कुछ भी…
पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर प्रभाव
पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर प्रभाव प्रश्न: पिछली शरीर यात्रा का अगली शरीर यात्रा पर क्या प्रभाव पड़ता है? उत्तर: पिछली शरीर यात्रा में जो पराभव से त्रस्त रहे,…
व्यवस्था का मूल स्वरूप
व्यवस्था का मूल स्वरूप~~~परमाणु-अंश में आचरण निश्चित नहीं होता। किसी गठन से पृथक होने पर परमाणु-अंश किसी एक तरह का आचरण नहीं करता, उसका आचरण बदलता रहता है। गठन से पृथक परमाणु-अंश…
सम्बन्ध और जीवन
सम्बन्ध और जीवन मानव को इन्द्रियों से कुछ ज्ञानार्जन होता है, और कुछ ज्ञानार्जन उसको समझने से होता है. जो ज्ञानार्जन होता है, उसको वह क्रियान्वित करता है. शब्द, स्पर्श, रूप, रस,…
समाधान-समृद्धि का अनुकरण
समाधान-समृद्धि का अनुकरण स्वयं में विश्वास नहीं है तो दूसरे पर विश्वास करना सम्भव नहीं है। आज के प्रचलित तरीके से जीने से आदमी अहमता के आधार पर अकेला हो गया है,…
ज्ञान और प्रक्रिया
ज्ञान और प्रक्रिया~~~मनुष्य को जो समझ में आता है – वही ज्ञान है। ज्ञान के चार स्तर हैं – जीव-चेतना, मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना। ज्ञान जीवन-संतुष्टि की वस्तु है। चार विषयों का…
ईश्वर और मुक्ति
ईश्वर और मुक्ति ईश्वर को मैंने व्यापक स्वरूप में देखा। उसी को “परमात्मा” नाम दिया जा सकता है – यदि इच्छा हो तो! ऐसे “व्यापक वस्तु में संपृक्त प्रकृति” के रूप में…
समाज
समाज “संबंधों का ताना-बाना ही समाज है| सम्पूर्ण सम्बन्ध संस्कृति, सभ्यता, विधि और व्यवस्था वादी हैं| समाज के यही चार आयाम हैं| इसकी सार्वभौमता ही इनका वैभव है| समाज की पूर्णता साम्प्रदायिक…
ज्ञानार्जन के बाद कार्यक्रम
ज्ञानार्जन के बाद कार्यक्रम ज्ञानार्जन करने में सभी स्वतन्त्र हैं। ज्ञानार्जन करने के बाद शुभ-कार्य में प्रवृत्त होना, प्रमाणित होना – यह वेतन-भोगिता के साथ संभव नहीं है। वेतन-भोगिता विधि से आदमी…
अमीरी और गरीबी में असंतुलन मानव-जाति की छाती के पीपल
अमीरी और गरीबी में असंतुलन मानव-जाति की छाती के पीपल ============================>आदि-काल से अभी तक हर समुदाय में नर-नारियों में असमानता – ऊपर-नीचे की बात, श्रेष्ठ और नेष्ट की बात, ज्यादा और कम…
जीने दो, जियो
जीने दो, जियो =========== मानव को चारों अवस्थाओं के साथ संतुलित रहने के लिए आवश्यक नियम है – “जीने दो, जियो”। ज्ञान-अवस्था (मनुष्य) के साथ सम्बन्ध में “जीने देने” का मतलब है…
ज्ञान
*ज्ञान* ==== ज्ञान होना आवश्यक है – यह सबको पता है। ज्ञान क्या है? – यह पता नहीं है। मध्यस्थ-दर्शन के अनुसन्धान से निकला – ज्ञान मूलतः तीन स्वरूप में है। सह-अस्तित्व…
सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग
*सत्य – ज्ञान – प्रमाण – भाग १ *===================== आदिकाल से, जबसे ईश्वर और ईश्वरीयता की चर्चा वांग्मय में (अर्थात लेख रूप में) अथवा मुखस्थ विधि से परम्परा के रूप में आरम्भ…
अनुभव ज्ञान
अनुभव ज्ञान https://youtu.be/qa7b5bMsvOo आपने “अनुभव ज्ञान” शीर्ष में लिखा है: “सत्ता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति, सत्ता (व्यापक) में संपृक्त जड़ चैतन्य इकाइयां अनंत व्यापक (पारगामी व पारदर्शी) सत्ता में संपृक्त सभी…