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जीवन विद्या सार

जीवन विद्या सार

Posted on December 3, 2023

जीवन विद्या सार

सह-अस्तित्व सहज नियमों का जो मूल नियम है वो है, संपूर्ण द्रश्य-अद्रश्य/रुप-अरुप/भौतिक-अभौतिक/स्थूल-सूक्ष्म अस्तित्व
सह-अस्तित्व के रुप में है, इसलिए हरपल-हरक्षण सह-अस्तित्व के द्रष्टिकोण के साथ जीना ही सह-अस्तित्व सहज मूल नियम है।

उपरोक्त बात को दूसरे तरीके से कहे तो स्वयं से लेकर संपूर्ण जड-चैतन्य संसार के साथ संवादिता-संगीतमयता/सामंजस्यता/सामरस्यता/तारतम्यता/एकसूत्रता/तालमेल पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज मूल नियम है।

इसको और सरल भाषा में कहे तो स्वयं से लेकर संपूर्ण जड-चैतन्य संसार के साथ मिलजुलकर रहना/Human friendly-Eco friendly तरीके से रहना/अपनत्व के भाव से रहना ही सह-अस्तित्व सहज मूल नियम है।

प्रचलित परंपरा की भाषा में कहे तो ‘वसुधैव कूटूंबकम’ की भावना से जीना ही सह-अस्तित्व सहज मूल नियम है।

बहुत ही संक्षिप्त में कहे तो, ‘संबंध’ की मानसिकता पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है।

‘संबंध’ शब्द को फैलाये तो मानव के साथ विश्वास, सम्मान, स्नेह, ममता, वात्सल्य, श्रद्धा, गौरव, कृतज्ञता, प्रेम पूर्वक रहना
और
मानवेत्तर संसार के साथ प्राकृतिक नियम पूर्वक रहना ही सह-अस्तित्व सहज मूल नियम है।

इसी नियम को और भी ब हुत तरीको से बताया जा सकता है जैसे कि..

अखंड समाज-सार्वभौम व्यवस्था की मानसिकता पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

समझदारी-ईमानदारी-जिम्मेदारी-भागीदारी पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

ज्ञान-विवेक-विज्ञान पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

मानव के साथ न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

मानवेत्तर संसार के साथ नियम-नियंत्रण-संतुलन पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

बौद्धिक-सामाजिक-प्राकृतिक नियम पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

उपयोग-सदुपयोग-प्रयोजन पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

मानव लक्ष्य(समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) के अर्थ में जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

जीवन लक्ष्य(सुख, शांति, संतोष, आनंद) के अर्थ में जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

स्वयं में समग्र व्यवस्था में भागीदारी पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

उपयोगीता-पूरकता की मानसिकता पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है..

‘जीने दो और जीओ’ की मानसिकता पूर्वक जीना ही सह-अस्तित्व सहज नियम है.. वगैरह-वगैरह।
अस्तित्व में नियम है ही,
बनाना नहीं है, समझना है और समझ पूर्वक जीना है।
यही एक मात्र सुखी होने का विकल्प है।

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“भूमि स्वर्गताम यातु
मनुष्य यातु देवताम्:
धर्मो सफलताम यातु
नित्यं यातु शुभोदयम्I “

-A.Nagraj, Propounder- Madhyasth Darshan

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