मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व – भाग १
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➡️प्रश्न: “मूल तत्व” से क्या आशय है?
“तत्व” से आशय है – सत्य। “ मूल तत्व” का मतलब है – मूल में सत्य क्या है, कैसा है? मानव जाति सदा से सत्यान्वेषी है। व्यापक वस्तु में समस्त जड़-चैतन्य वस्तुएं संपृक्त हैं, और रूप-गुण-स्वभाव-धर्म संपन्न हैं, जिससे प्रत्येक एक त्व-सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदार है – यह ज्ञान मानव के अनुभव में आता है। यह ज्ञान अनुभव में आने से – विकास-क्रम, विकास, जागृति-क्रम, और जागृति स्पष्ट हो जाता है। फिर अनुभव-मूलक विधि से उसको व्यक्त करने के लिए चित्रण होता है।
➡️प्रश्न: “संपृक्तता” से क्या आशय है?
संपृक्त रहना = डूबा हुआ, भीगा हुआ, घिरा हुआ होना। घिरा हुआ होने से वस्तु का कार्य-क्षेत्र निश्चित होता है, हर वस्तु किसी निश्चित लम्बाई-चौड़ाई-ऊंचाई में ही कार्य करता है – यही ‘नियंत्रण’ है। भीगा हुआ होने से ऊर्जा-सम्पन्नता है। जड़-प्रकृति में ऊर्जा-सम्पन्नता कहलाता है। चैतन्य-प्रकृति में ज्ञान-सम्पन्नता कहलाता है।
व्यापक वस्तु में सभी जड़-चैतन्य वस्तुएं समाहित हैं। प्रकृति का निवास-स्थली व्यापक-वस्तु है। व्यापक वस्तु हर स्थान पर है. जहां प्रकृति की इकाई नहीं है – वहाँ भी, और जहां प्रकृति की इकाइयां हैं – वहाँ भी। इकाई और व्यापक दोनों साथ-साथ हैं। एक-एक वस्तु के बिना व्यापक की पहचान नहीं है। व्यापक वस्तु के बिना एक-एक वस्तु में ऊर्जा-सम्पन्नता (जड़-प्रकृति में), ज्ञान-सम्पन्नता (चैतन्य-प्रकृति में) नहीं है। इकाइयों के व्यापक-वस्तु में ‘भीगे रहने’ के आधार पर यह है।
व्यापक वस्तु की ‘पारदर्शीयता’ (आर-पार दिखना) सामान्य रूप से समझ आती है। इसकी ‘व्यापकता’ (सर्वत्र एक सा होना) भी सामान्य रूप से समझ आती है। मूलतः व्यापक वस्तु की ‘पारगामीयता’ को समझना है। व्यापक-वस्तु ही ज्ञान है – यह अनुभव में आता है।
➡️प्रश्न: वस्तु के “धर्म” से क्या आशय है?
वस्तु का “त्व-सहित व्यवस्था होना और समग्र व्यवस्था में भागीदार होना” उसके ‘धर्म’ से सम्बंधित है। जैसे – मानव का सुख-धर्म उसके ‘त्व-सहित व्यवस्था होने’ या ‘तृप्त होने’ से सम्बंधित है। इस तरह तृप्त होने का प्रयोजन है – मानव समग्र-व्यवस्था में भागीदारी करे। प्रत्येक वस्तु का धर्म उसके स्वभाव, गुण, और रूप के साथ व्यक्त है। इस तरह वस्तु को हम उसके रूप, गुण, स्वभाव, धर्म के साथ पूरा पहचानते हैं।
मानव-परंपरा में ही ज्ञान-अवस्था का प्रकटन है। अकेले जीवन (शरीर के बिना) ज्ञान-अवस्था की व्यवस्था को प्रमाणित नहीं कर पाता है। मानव सुख-धर्मी है. सुख के लिए समाधान आवश्यक है। समाधान समझदारी के बिना आता नहीं है।
पदार्थ-अवस्था में अस्तित्व-धर्म कोई मात्रा नहीं है। प्राण-अवस्था में पुष्टि-धर्म कोई मात्रा नहीं है। जीव-अवस्था में आशा-धर्म कोई मात्रा नहीं है। मानव में सुख-धर्म कोई मात्रा नहीं है। “ होने” की स्वीकृति मात्रा नहीं है। “ होने वाली वस्तु” एक मात्रा है। जड़ वस्तु में जो ऊर्जा है, वह कोई ‘मात्रा’ नहीं है। जड़-वस्तु के व्यापक में भीगे होने का परिणाम है – जड़-वस्तु का ऊर्जा-संपन्न होना, क्रियाशील होना। निरपेक्ष-शक्ति (व्यापक) प्राप्त है, इसीलिये क्रियाशीलता है। क्रियाशीलता वश सापेक्ष-शक्तियां (ताप, ध्वनि, विद्युत) पैदा होती हैं। क्रियाशीलता न हो तो कोई सापेक्ष-शक्तियां पैदा नहीं हों। मानव में जो ज्ञान है, वह कोई मात्रा नहीं है। ज्ञान व्यापक वस्तु है. मानव के व्यापक में भीगे होने का परिणाम है – मानव का ज्ञान-संपन्न होना। अनुभव संपन्न होने पर ज्ञान ही व्यापक होने का गवाही मानव देता है। “ ज्ञान व्यापक है” – यह गवाही के साथ यह कहना बनता है, “सह-अस्तित्व अपने प्रतिरूप के रूप में मानव का प्रगटन किया।” सम्पूर्ण व्यवस्था सह-अस्तित्व में ही है, इसलिए मानव को सह-अस्तित्व में व्यवस्था को प्रमाणित करना है।
➡️प्रश्न: उदघोष – “जीने दो, और जियो” – से क्या आशय है?
व्यवस्था में सबको जीने देना और स्वयं व्यवस्था में जीना। व्यवस्था में सबको जीने दिए बिना स्वयं व्यवस्था में जी भी नहीं सकते। व्यवस्था के स्वरूप को समझे बिना व्यवस्था में जीने देना और व्यवस्था में स्वयं जीना बनता ही नहीं है। इसलिए व्यवस्था के स्वरूप को समझना मानव के लिए बहुत आवश्यक है। मानव ज्ञान-अवस्था की इकाई है. मानव को जिस ज्ञान से जीने की आवश्यकता है उसको उसे पहचानने की आवश्यकता है। जीव-चेतना में जीते तक “जीने देना” बनता नहीं है। मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्य-चेतना के ज्ञान में पारंगत होने के बाद “जीने देना” स्वाभाविक होता है। जीने दिए बिना जीना बनता ही नहीं है। कभी विरक्ति, कभी भय पीड़ित करता ही रहता है।
➡️प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?
जानना अनुभव है. मानना संकल्प है। जानना पूरा ही होता है.
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व – भाग २
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➡️प्रश्न: “यथार्थ” क्या है?
जैसा जिसका अर्थ है – वह यथार्थ है। चारों अवस्थाओं का अर्थ अलग-अलग है।
➡️प्रश्न: “भ्रमित-मानव कर्म करते समय स्वतंत्र, और फल भोगते समय परतंत्र है तथा जागृत मानव कर्म करते समय, और फल भोगते समय स्वतंत्र है” – इससे क्या आशय है?
जागृत-मानव को अपने कर्म के फल का पता है, इसलिए वह स्वतंत्र है। भ्रमित मानव को कर्म-फल का पता नहीं है, पर कर्म कर देता है। अभी जैसे भ्रमित-मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र था, जिसके फल में धरती बीमार हुई। इन कर्मो को करते समय उसको अपने कर्मो के फल का पता नहीं था। “ धरती को बीमार करना है” – यह लक्ष्य बना कर भी उसने उन कर्मो को नहीं किया। यह भ्रमित-मानव के फल भोगने में परतंत्र होने का मिसाल है।
➡️प्रश्न: “मानवत्व सहित व्यवस्था” क्या मानव के अकेले में है, या अन्य मानवों (परिवार, समाज) के साथ है?
व्यवस्था एक से अधिक के साथ ही है। एक परमाणु में भी एक से अधिक परमाणु-अंश हैं। एक रचना की व्यवस्था भी एक से अधिक अणुओं से है। एक अकेला अणु कोई रचना नहीं है। अस्तित्व का पूरा ढांचा ही सह-अस्तित्व है। मानवत्व सहित व्यवस्था भी परिवार, परिवार-समूह, ग्राम, ग्राम-समूह से लेकर अखंड-समाज तक है।
➡️प्रश्न: “अनुगमन” से क्या आशय है?
अनुभव की ओर गमन (जाना)। अनुगमन का क्रम है – स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण, कारण से महाकारण। यही अनुक्रम है। शरीर स्थूल है। जीवन सूक्ष्म है। बुद्धि और आत्मा कारण है। व्यापक-वस्तु महाकारण है।
➡️प्रश्न: “अनुभव” और “अनुभूति” में क्या अंतर है?
अनुभव दृष्टा पद है। अनुभव को प्रमाणित करने के क्रम में अनुभूतियाँ हैं। प्रमाणित करने के क्रम में अनेक आयामों में हम अनुभूतियाँ करते ही हैं। अनुभूति अनुभव-मूलक होने वाली क्रिया है।
अनुभव एक है – जो सह-अस्तित्व में ही होता है। अनुभव “सह-अस्तित्व का प्रतिरूप” होता है। अनुभूतियाँ अनेक हैं – जो अनुभव को जीने में प्रमाणित करने के क्रम में हैं। अनुभूतियों के मूल में अनुभव है। अनुभव स्थिति रूप में है. अनुभूतियाँ गति रूप में हें।
- श्रद्धेय बाबा श्री ए. नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, अमरकंटक)
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