“अमानवीय मानव कितना भी रूपवान, बलवान, धनवान एवं पदवान हो जाय, वह अजागृत के जागृति के लिए सहयोगी नहीं हो पाता है। इसके विपरीत में मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्ण मानव कितना भी न्यूनतम रूप, बल, धन एवं पद से सम्पन्न क्यों न हो उनका अजागृत के जागृति में सहायक होना पाया जाता है। जैसे अत्यन्त कुरूप मानव भी जब व्यक्तित्व एवं प्रतिभा से सम्पन्न होता है तब उनसे अधिकाधिक रूपवान, बलवान, धनवान एवं पदवान को शिक्षा एवं उपदेश मिलता है। उसे वे ग्रहण करते हुए देखे जाते हैं। इस प्रमाण से यह सिद्ध हो जाता है कि बुद्धि अन्य चारों अर्थात् रूप, बल, धन एवं पद से वरीय है। व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का मूल रूप बौद्धिक क्षमता अर्थात् प्रबुद्धता ही है। बौद्धिक क्षमता में ही गुणात्मक परिवर्तन होता है न कि रूप, बल, धन व पद में। फलत: व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संतुलन स्थापित होता है। व्यक्तित्व विहार, व्यवहार एवं आहार में प्रकट होता है। प्रतिभा ज्ञान-विज्ञान विवेकपूर्वक व्यवस्था एवं उत्पादन अर्थात् निपुणता कुशलता एवं पाण्डित्य में प्रत्यक्ष होती है। इन दोनों का संतुलन ही सह-अस्तित्व का रूप है। निर्विरोधिता ही जीवन का अभीष्ट है। यही अभ्युदय एवं निरन्तर शुभोदय का उदय है।”
श्री ए.नागराज जी
अभ्यासदर्शन
(अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन)
नोट- कृपया माने नहीं, जाँच कर ही माना जाये|