नियम, नियति, विश्राम, गंतव्य
(१) नियम व्यापक है।
(2) व्यापक में प्रकृति अविभाज्य रूप में संपृक्त है।
(३) संपृक्तता से प्रकृति ऊर्जा-संपन्न है। ऊर्जा-सम्पन्नता वश प्रकृति क्रियाशील है। क्रियाशीलता से प्रकृति में प्रगटन-क्रम के रूप में जागृति की ओर एक निश्चित “दिशा” है। यही “नियति-क्रम” है।
(४) “नियति क्रम” की वजह से, प्रकृति की इकाइयाँ अपनी स्थिति के अनुसार नियम का पालन करने (गति) के लिए बाध्य हैं।
(५) प्रकृति की किसी भी इकाई का आचरण (उसके “करने” का स्वरूप) ही “नियम” का प्रकाशन है।
(६) मनुष्येत्तर प्रकृति (मानव को छोड़ कर बाकी सभी प्रकृति की इकाइयाँ) नियम का स्वयं-स्फूर्त रूप से पालन करती हैं – जिससे उनका निश्चित-आचरण प्रकाशित होता है। इस निश्चित-आचरण को मनुष्य अध्ययन पूर्वक जान पाता है।
(७) मनुष्य जब तक “नियम” को नहीं जान पाता – तब तक उसका आचरण अनिश्चित रहता है। अनिश्चित-आचरण के साथ मनुष्य “सुख की चाहत” के साथ “दुखी” रहता है।
(८) “नियम” को समझने के लिए मनुष्य अध्ययन या अनुसंधान करने के लिए बाध्य है।
(९) अध्ययन अध्यापक के अनुभव की रोशनी में होता है, और विद्यार्थी की कल्पनाशीलता द्वारा होता है। यह एक “निश्चित विधि” है।
(१०) अनुसंधान समाधि-संयम की “अनिश्चित विधि” से होता है।
(११) अध्ययन और अनुसंधान की सफलता “कल्पनाशीलता के तृप्ति-बिंदु” की प्राप्ति के रूप में है। कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिंदु ही “सह-अस्तित्व में अनुभव” है। यही “श्रम का विश्राम” है।
(१२) सब कुछ समझने-करने के बाद भी कुछ और समझने-करने की ज़रुरत मुझ में है, ऐसा मुझे लगना – ही मेरे “श्रम का क्षोभ” है। श्रम का क्षोभ ही “विश्राम की तृषा” है। विश्राम की तृषा ही मनुष्य में “सुख की चाहत” है। यही पुनर्प्रयास के लिए स्वयं में “आवश्यकता” है। फिर से उपरोक्त बिंदु (७)पर जाने की ज़रुरत है।
(१३) “मैं सब कुछ समझ चुका हूँ और अब समझ को जीने में प्रमाणित कर सकता हूँ” – यह स्थिति स्वयं में निरंतरता के रूप में बन जाना ही “श्रम का विश्राम” है। ऐसा होने पर – मनुष्य द्वारा बहुत कुछ “करने” के बाद भी और “करने” के लिए उत्साह स्वयं में बना रहता है। यही “समझ के करने” का मतलब है।
(१४) “समझ के करने” का गंतव्य है – “अखंड-समाज” और “सार्वभौम-व्यवस्था” का धरती पर स्थापित होना। यही नियति-क्रम का लक्ष्य है – इसलिए यही “गति का गंतव्य” है।
स्त्रोत: मध्यस्थ दर्शन, प्रस्तुति अध्ययन-क्रम में (राकेश भैया जी द्वारा)
साभार- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)