मानव-चेतना ••••••••••••••“मानव-चेतना” एक शब्द है। इस शब्द का अर्थ है – ज्ञान। ज्ञान रासायनिक-भौतिक वस्तु नहीं है। जड़-चैतन्य वस्तु सत्ता में संपृक्त है. सत्ता व्यापक वस्तु है, जिसमे भीगे रहने से जड़-प्रकृति…
उपसंहार
उपसंहार •••••••••मैंने जो सब प्रस्तुत किया है – चार भाग में दर्शन, तीन भाग में वाद, तीन भाग में शास्त्र, उसके साथ संविधान – उस पूरी बात का मतलब मैं बताना चाहता…
पठन से अध्ययन
पठन से अध्ययन ==========पढ़ना आ जाने या लिखना आ जाने मात्र से हम विद्वान नहीं हुए। समझ में आने पर या पारंगत होने पर ही अध्ययन हुआ। समझ में आने पर ही…
jeevan Vidya content
Greetings everyone, Please find below the links for the discussed sources – Youtube Shivir Playlists – Parichay Shivir (Nikora – Som Tyagi) – https://youtube.com/playlist?list=PLqNLnOTQEJKYzKLyDhXd2Pt-HecyDeMjf Adhyan Bindu Shivir (Nikora – Som Tyagi) –…
जीवन विद्या अध्ययन विन्दु शिविर 2024
घोषणाजीवन विद्या अध्ययन विन्दु शिविरस्रोत: मध्यस्थ दर्शनप्रणेता: एo नागराजअभ्युदय संस्थान,धनौरा, हापुड़ (Delhi-NCR) दिनांक:- 30 मार्च की सायंकाल से 7 अप्रैल 2024 के अपराह्न तक प्रबोधक: सोम त्यागी भाई जीनोट:
कल्पनातीत उपलब्धि
कल्पनातीत उपलब्धि ••••••••••••••••••••••मैंने जो उपलब्धि पायी वह कल्पनातीत है. ऐसी कल्पना कोई कर नहीं पाया कि ऐसा कोई उपलब्धि होगा जिसमे सबके लिए जवाब होगा, जिसमे सबके लिए समाधान होगा, जिसमे सबके…
मानव की परिभाषा
मानव की परिभाषा मानव की परिभाषा है – मनाकार को साकार करने वाला, और मनः स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला। ➡️प्रश्न: “मनाकार को साकार करने” से क्या आशय है? क्या साकार करने…
तरण-तारण की सार्थकता
तरण-तारण की सार्थकता इस सौभाग्यशाली मुहूर्त में आप हम सब यहाँ (अमरकंटक में) उपस्थित हुए हैं। इस स्थान को युगों से हम मानव सर्वोपरि पवित्र-स्थल मान कर चले हैं। “यहाँ सभी प्रकार…
संवाद
संवाद •••••••➡️प्रश्न: “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” से क्या आशय है? उत्तर: “चेतना विकास” को छोड़ करके “मूल्य शिक्षा” होता नहीं है। इसीलिये “चेतना विकास – मूल्य शिक्षा” एक साथ कहा। आज…
वर्तमान शिक्षा प्रणाली
“वर्तमान शिक्षा प्रणाली” वर्तमान शिक्षा प्रणाली क्या उत्पन्न कर रही है? पढ़े – लिखे हुनरमंद (skilled) मजदूर ! चाहे वह इंजीनियर के नाम पर हो या मेडिकल के नाम पर।एक इंजीनियर को…
आवर्तनशील अर्थशास्त्र : दार्शनिक आधार
आवर्तनशील अर्थशास्त्र : दार्शनिक आधार ••••••••••••••••••••••••••मनुष्य ही सर्वशुभ की अपेक्षा करता है। अर्थशास्त्र का अध्ययन समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व क्रम में है। समृद्धि का धारक-वाहक एक परिवार होता है। परंपरा में…
जीवन एक परमाणु
जीवन एक परमाणु ••••••••••••••••••••परमाणु व्यवस्था का मूल रूप है. कम से कम दो परमाणु-अंश मिल करके एक परमाणु को बनाते हैं. उसी तरह अनेक अंशों से मिल कर बने हुए भी परमाणु…
विकास(जागृति) के लिए किये गये व्यवहार……
विकास(जागृति) के लिए किये गये व्यवहार को पुरुषार्थ, निर्वाह के लिए किये गए व्यवहार को कर्तव्य तथा भोग के लिए किए गए व्यवहार को विवशता के नाम से जाना गया है।भोगरूपी आवश्यकताओं…
अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था
अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था •••••••••••••••••••••••••••••••••“मैं इस बात का सत्यापन करता हूँ कि संवेदनाओं के संयमित होने से पहले धरती पर एक भी व्यक्ति “अखंड समाज – सार्वभौम व्यवस्था” को सोच नहीं…
मानव का कुल योजना और कार्यक्रम
मानव का कुल योजना और कार्यक्रम •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••सम्मान किसका करना है, यह अभी तक मानव जाति में तय नहीं हो पाया। लफंगाई का सम्मान हुआ है। तलवार का सम्मान हुआ है। जो चुपचाप…
मूल तत्व – अवलोकन शिविर
मान्यवर,सूचना: अभ्युदय संस्थान, अछोटी में –*मूल तत्व – अवलोकन शिविर * अप्रैल – माह 2024 (दिनांक: 14 अप्रैल से 28 अप्रैल 2024 तक)) * स्थान: अभ्युदय संस्थान, अछोटी, दुर्ग छत्तीसगढ़*.Please, Click link…
संवाद की अंतिम बात
संवाद की अंतिम बात•••••••••••••••••••••••अभी हमारे इतने दिनों के सम्बन्ध में और संभाषण में जो आपको बोध होना था वह हुआ कि नहीं हुआ? -> मुझसे यह कहना नहीं बन पा रहा है,…
*प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?*
*प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?* प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना…
अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे
अनुसंधान क्यों, क्या, और कैसे – भाग-१ यह जीवन-विद्या राष्ट्रीय सम्मलेन सुखद, सुंदर, सौभाग्य-पूर्ण हो – यह मेरी शुभ कामना है। मूल में मुझे यह बताने के लिए कहा गया है की…
निराकार और साकार
निराकार और साकार साकार और निराकार की बहुत चर्चाएं हुई हैं. यह सम्माननीय तर्क भी है, विचार भी है. इसका समाधान भी उतना ही सम्मान करने योग्य है. अस्तित्व को यदि समझना…
संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन
संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन संदेश, सूचना, फ़िर अध्ययन। अध्ययन के बाद रुकता नहीं है। आप-हमारे बीच में संदेश और सूचना हो गयी है – अब अध्ययन की बारी है। अध्ययन में हम…
ज्ञानगोचर वस्तु पहचानने की आवश्यकता
ज्ञानगोचर वस्तु पहचानने की आवश्यकता•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••ज्ञानगोचर सभी वस्तु पहचानने में आ जाए और प्रमाणित हो जाए – इसका नाम है अध्ययन. अनुभव की रोशनी में, स्मरण पूर्वक किये गए प्रयास को अध्ययन कहा….
शंका का समाधान
शंका का समाधान ••••••••••••••••••मुझसे रायपुर में शिक्षा से जुड़े १५० लोगों की एक बैठक में एक शंका व्यक्त किया गयी थी – “आपकी बात कहीं एक सम्प्रदाय तो नहीं बन जायेगी?” इसके…
बुद्धि-जीवियों के साथ परेशानी
बुद्धि-जीवियों के साथ परेशानी जीवन-ज्ञान और सह-अस्तित्व ज्ञान संपन्न होने पर हम “समझदार” हुए। समझदारी के साथ मानवीयता पूर्ण आचरण को जोड़ने से हम “ईमानदार” हुए। इस तरह ईमानदारी जोड़ने पर “जिम्मेदारी”…
इच्छा
इच्छा इन्द्रिय की परिभाषा है – इच्छा पूर्वक द्रवित होने वाला अंग. मानव जीवन में इच्छा होती है. इच्छा का स्वरूप ही है – ये चाहिए, ये नहीं चाहिए. इसी इच्छा के…
जीवन विद्या परिचय शिविर अछोटी
मान्यवर,🙏अभ्युदय संस्थान, अछोटी में जीवन विद्या परिचय शिविर के लिए.. आरक्षित करें अपना समय🙏. सूचना- अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन मध्यस्थ दर्शन सह अस्तित्ववाद पर आधारित जीवन विद्या परिचय शिविरप्रबोधक: संकेत ठाकुर…
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरूप
मध्यस्थ-क्रिया का स्वरूप ••••••••••••••••••••••••••••सत्ता किस वास्तविकता को व्यक्त करती है? सत्ता मध्यस्थ वस्तु है। वस्तु का मतलब है – जो वास्तविकताओं को व्यक्त करे। पारगामी, पारदर्शी, और व्यापक स्वरूप में सत्ता प्रस्तुत…
प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?
प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है? जानना अनुभव है. मानना संकल्प है। जानना पूरा ही होता है. जीने में प्रमाणित…
प्रभाव
प्रभाव •••••••सत्ता का प्रभाव सर्वत्र बना रहता है, सत्ता विकृत नहीं होता। उसी तरह प्रत्येक वस्तु का प्रभाव है। किसी वस्तु का प्रभाव जितनी दूर तक है, उससे वह वस्तु विकृत नहीं…
जीवन विद्या परिचय शिविर 2024
जीवन विद्या परिचय शिविर मानव में परिवार समाज व्यवस्था, मूल्य चरित्र नीति, व्यवसाय समाज प्रकृति, कार्य व्यवहार विचार अनुभव, जड़ चैतन्य व्यापक, भौतिक रासायनिक व चैतन्य क्रिया, न्याय धर्म सत्य का अर्थ…
साधना का फल
साधना का फल साधना करने वालों का संसार ने सम्मान किया है. साधना का फल किन्तु संसार को नहीं मिला. साधना करने वाले को साधना से कुछ मिला या नहीं मिला यह…
समझ और आचरण
समझ और आचरण मानव-चेतना संबंधी ज्ञान हमको समझ में आए और आचरण में नहीं आए ऐसा हो नहीं सकता। हम समझदार हो और भीख मांग कर खाएँ, ऐसा हो नहीं सकता। हम…
योग यानी मिलन
योग यानी मिलन स्वयं का स्वयं के साथ मिलन भी एक योग है. शारिरीक व्यवस्था/शारिरीक स्वास्थ्य के अर्थ में शरीर के साथ संयमपूर्वक, मिलजुलकर रहना भी एक योग है. पारिवारिक व्यवस्था/पारिवारिक स्वास्थ्य…
मानव समुदाय चेतना का एक इतिहास
मानव समुदाय चेतना का एक इतिहास ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••“…उक्त प्रकार से आदि मानव ने एक स्थान अथवा देश में शरीर यात्रा प्रांरभ किया, या एक से अधिक देश अथवा स्थान में आरंभ किया –…
हर व्यक्ति समझदार होने योग्य है।
मनुष्य जाति में आज तक शुभ से जीने की अपेक्षा तो रही, पर शुभ का मॉडल नहीं रहा। अब वह मॉडल आ गया है। स्वयं तृप्त होने के बाद उसको प्रमाणित करने…
पूर्णता के अर्थ में वेदना
पूर्णता के अर्थ में वेदना ••••••••••••••••••••••••जीव-चेतना में मानव शरीर को जीवन मानता है। जीवन अपनी आवश्यकताओं को शरीर से पूरा करने की कोशिश करता है, जो पूरा होता नहीं है, इसलिए अतृप्त…
मानव तीर्थ में कार्तिक पूर्णिमा, को *’कृतज्ञता दिवस’* मनाया गया।
नमस्ते,मानव तीर्थ में 27 नवंबर 2023, कार्तिक पूर्णिमा, को *’कृतज्ञता दिवस’* मनाया गया। कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट संलग्न है।
नैसर्गिकता का नित्य वैभव
नैसर्गिकता का नित्य वैभव “भाव ही धर्म है| भाव मौलिकता है| धर्म का व्यवहार रूप ही न्याय है| धर्म स्वयं परस्पर पूरकता के अर्थ में स्पष्ट है| परस्परता सम्पूर्ण अस्तित्व में स्पष्ट…
पृथ्वी गंधवती है.
पृथ्वी गंधवती है. “पृथ्वी गंधवती है” – वैदिक-विचार में भी इस बात को कहा है। सुगंध और दुर्गन्ध दोनों प्राण-अवस्था से स्पष्ट हुई। जीवों में गंध के आधार पर अपने आहार को…
अस्तित्व का स्वरूप
अस्तित्व का स्वरूप •••••••••••••••••••••समाधि-संयम पूर्वक अस्तित्व का स्वरूप मुझे समझ में आया। अभी तक अस्तित्व के बारे में जो ब्रह्मवादी कहते रहे हैं – वैसा नहीं है अस्तित्व! ब्रह्मवादियों का कहना है…