मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्व वाद, प्रणेता- श्री ए नागराज जी द्वारा प्रस्तावित शिक्षा और व्यवस्था विकल्प की रोशनी में…..अध्ययन अभ्यास के लिए विशेष ऑनलाइन प्रस्तुति
परिभाषा विधि से अवधारणा की स्पष्टता
प्रत्येक रविवार प्रातः 5 बजे से 06:30 बजे तक।
उद्देश्य:
पूज्य श्री अग्रहार नागराज जी द्वारा परिभाषित सच्चाई को यथावत समझना ताकि उनके द्वारा अनुभूत अस्तित्व की अवधारणा के निकट हम पहुंच सके।
प्रक्रिया:
प्रश्नोत्तर सहज संवाद
हम सभी अध्ययनार्थी अपने पठन मनन में बने रहते हुए, विगत 20 वर्षों में पूज्य बाबा जी का सानिध्य प्राप्त अध्येताओं से, जिन्होंने मध्यस्थ दर्शन विकल्प होने का सत्यापन पूज्य बाबा जी के समुख किया और अभी तक अपने सत्यापन के साथ बने हुए हैं …. ऐसे आदरणीय वरिष्ठ व्यक्तियों के साथ चर्चा, प्रस्तुतियां होंगी। साथ ही, शिक्षा के मानवीकरण की दिशा में, सार्थक भागीदारी के अर्थ से, निश्चित अवधि में स्वयं मूल्यांकन के अभ्यास में ऑनलाइन MCQ (multiple choice question) टेस्ट प्रक्रिया को भी करने का प्रस्ताव है।
पंजीकरण लिंक:
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSc4AP8BU7z_335l45ImEAeiMQEWIicqxpV2SSvkhRTXN956OA/viewform?usp=sf_link
इच्छुक अध्ययनार्थी को निम्न लिंक पर पंजीयन करने का विनय है।
आकांक्षी:
उत्सव पारा परिवार एवं देवघर अध्ययन शील परिवार
नोट: उक्त सत्र के प्रारम्भ होने के तिथि की घोषणा शीघ्र ही की जाएंगी।
नमस्ते
मध्यस्थ दर्शन, परिभाषा से अवधारणा, सत्र के संदर्भ में कुछ आवश्यक बातें, जो हम, आप सभी के साथ निवेदन करना चाहते हैं:-
1.उक्त सत्र के मूल में मुख्य आशय यह है कि मध्यस्थ दर्शन की अवधारणा का श्रवण हो, मनन हो एवं ऐसे श्रवण मनन पूर्वक साक्षात्कार भी हो, ताकि, यह हमारे स्वत्व रूपी अवधारणा में प्रतिष्ठित हो सके।
2.परिभाषा से भाषा की स्वीकृति होने से तदाकारता और तदावलोकन सटीक हो पाती हैं और इस तरह शोध एवं स्वत्व का विकास निश्चित दिशा में हो पाता है, जो कि शिक्षा एवं व्यवस्था में भागीदारी के लिये आवश्यक है।
3.हमने पहचाना है कि मध्यस्थ दर्शन शिक्षा एवं व्यवस्था के लिये विकल्प है क्योंकि यहां ‘ज्ञान’, विवेक एवं विज्ञान के रूप में उद्धृत होकर न्याय और धर्म प्रमाण के अर्थ में व्यवहृत है। यहाँ अथ से इति तक का वर्णन है जो कि शिक्षा एवं व्यवस्था में क्रमिक विकास के लिये आवश्यक घटक है।
4.इस अर्थ से, शिक्षा एवं व्यवस्था में पर्याप्त भागीदारी क्रम में परिभाषा विधि से इनका शोध होना एक प्रधान कार्यक्रम है। उक्त सत्र के माध्यम से यह शोध कार्य एवं साथ ही साथ पाठ्य लेखन कार्य को भी पूरा करना हमारा इष्ट है। इसलिए, ऐसे शोध कार्य को इच्छुक, देश भर के सभी अध्ययनार्थी गण, अवश्य इसमें पंजीयन कराएं ताकि इस कार्य को मिलकर पूरा किया जा सके।
5.हमारा विश्वास है कि शिक्षा में मध्यस्थ दर्शन को ले जाने के क्रम में कई प्रकार से लेखन का कार्य होना है। ऐसे समस्त लेखन और शोध कार्य में यह अवधारणा सत्र पूरक साबित होगा।
6.जो परिभाषित हो , वही शिक्षा की विषय वस्तु बन सकती है। इस प्रकार, मध्यस्थ दर्शन, शिक्षा की विषय वस्तु के रूप में विकसित होने के लिये पूर्ण समर्थ है, क्योंकि यहाँ उधृत सभी शब्द परिभाषित हैं। सिर्फ आवश्यकता है ऐसे छात्र बनाम शिक्षक का जो इसे शिक्षा में ले जाने धारक-वाहक बनेंगे।
7.उक्त बातों के साथ निवेदन करना है कि, जो भी अध्ययनार्थी, जहाँ भी रहकर अध्ययन कर रहे हैं, वे इसमें अवश्य अपने श्रम लगाएं और जितने भी सार्थक प्रश्न बन सकते हैं, जो कि मानव शिक्षा के लिये उपयोगी हो सकते हैं, उन्हें वे हम सभी के बीच रखें। ऐसा करने से यह सत्र सार्थक हो सकेगा।
8.हमें उम्मीद है कि शिक्षा के माध्यम से स्वायत्त मानव, परिवार मानव एवम व्यवस्था मानव के विकसित होने की दिशा में यह अवधारणा सत्र पूरक साबित हो सकेगा।🙏🙏