संग्रह का तृप्ति बिंदु किसी भी देश-काल में किसी एक व्यक्ति को भी नहीं मिल पाया।
संसार का हर मानव “समृद्धि” चाहता है और वो आहार-आवास-अलंकार संबंधी वस्तुओं के आधार पर हो पाता है न कि प्रतीक मुद्रा(रुपये-पैसों) के आधार पर।
“समृद्धि” का भाव परिवार में ही होता है। एक परिवार समृद्ध होने के लिए एक से अधिक परिवार का समृद्ध रहना अनिवार्य है। इस क्रम में अकेले में समृद्ध होने की कल्पना और संग्रह विधि से समृद्धि की कल्पना दोनों भ्रम सिद्ध हुआ।
अभाव का अभाव ही “समृद्धि” है।
ए नागराज जी.