सत्य – ज्ञान – प्रमाण भाग – २
समझदारी से ही समाधान होना प्रमाणित होता है। नासमझी से ही सारी समस्याएं होती हैं।
जो समझदार होते नहीं है पर स्वयं को समझदार मान लेते हैं – ऐसे लोगों से ही सर्वाधिक समस्याएं मानव-कुल में समाहित हुआ है।
उपरोक्त बात की गवाही में – जितनी भी समस्याएं अभी तक मानव ने घटित कराई हैं, वे सभी का सभी समर्थ-समुदाय या समर्थ-व्यक्ति द्वारा ही घटित कराई गयी हैं। जब इस बात के प्रति हम सुनिश्चित होते हैं तो यह प्रश्न बनता है – वह कौनसा ज्ञान है, कौनसा विवेक है, कौनसा विज्ञान है – जिससे हम सर्वतोमुखी समाधान के अर्थ में जी सकें, प्रमाणित कर सकें, परम्परा के रूप में पुष्ट हो सकें (अर्थात जिसको सभी परिवार अपना सकें) ? भारतीय वैदिक विचार के अनुसार “ज्ञान” को लेकर सभी प्रयास, तप, जप, अभ्यास करने के बाद भी ज्ञान का “स्वांत सुख” के अर्थ में ही सीमित रहना बना। सर्व-सुख के लिए ज्ञान, विवेक, और विज्ञानं प्रस्तावित नहीं हो पायी।
एक संयोग पूर्वक, समाधि-संयम पूर्वक अनुसंधानित ज्ञान, विवेक, और विज्ञान सर्व-शुभ के लिए पर्याप्त होना समझ में आ रहा है। सर्व-सुख में व्यक्तिगत सुख समाया ही है। अनुसंधान विधि से निष्पन्न यह ज्ञान (सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान का संयुक्त रूप) व्यवहार में मानव-चेतना, देव-चेतना, और दिव्या-चेतना को प्रमाणित करने योग्य है। इस ज्ञान को प्रयोग विधि से प्रमाणित करना सफल हो गया है। इसी निष्कर्ष के आधार पर ही इस ज्ञान के लोकव्यापीकरण की अपेक्षा बनी। इसी कारणवश इसे संसार के सम्मुख “प्रस्ताव” के रूप में रखा है। यह सूचना आपके लिए इसी उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें पारंगत होने की अपेक्षा और आवश्यकता होने पर आप इसका अध्ययन कर सकते हैं।
इस ज्ञान का लोकव्यापीकरण “अध्ययन विधि” से होने की व्यवस्था है। आज के समय तक अत्याधुनिक प्रचलित विज्ञान शिक्षा विधि से लोकव्यापीकरण हो चुका है। प्रचलित-विज्ञान विधि से मानव का अध्ययन न हो पाने के आधार पर – मानव को “भय” और “प्रलोभन” का पुतला मान कर संग्रह-सुविधा के लिए व्यापार का आडम्बर फैलाया गया है। इसी क्रम में मानव ने अपने स्व-विवेक से बहुत सारे ऐसे संस्थाएं भी बनाया है – जो मानव का अध्ययन कर सकें, मानव सहज अपेक्षाओं को पूरा करने के उद्देश्य से काम कर सकें। लेकिन इनमें भी मानव का अध्ययन संपन्न कराने के लिए अनुकूल पाठ्यक्रम और अध्ययन का संयोग नहीं हो पाया। मानव सहज-अपेक्षा के रूप में सच्चाई को समझने के लिए सदा-सदा से इच्छुक रहा है। इस अपेक्षा और इच्छा के अनुकूल प्रस्ताव को रखना एक आवश्यकता बनी रही। अब सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान मानव को शाश्वतीयता के अर्थ में अध्ययन करना सम्भव हो गया है। यह प्रस्ताव “विकल्प” के रूप में इसीलिये प्रस्तुत हुआ है, क्योंकि विगत से प्राप्त भौतिकवाद और आदर्शवाद दोनों विधियों से “स्वयं का अध्ययन” और “समग्र-अस्तित्व का अध्ययन” लोकसुलभ नहीं हो पाया।
सह-अस्तित्व में व्यापक रुपी साम्य-ऊर्जा में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति ऊर्जा-संपन्न है। ऊर्जा-संपन्न होने से जड़-चैतन्य प्रकृति चुम्बकीय-बल संपन्न है। बल-संपन्न होने से ही प्रकृति क्रियाशील है। क्रियाशीलता ही श्रम-गति-परिणाम स्वरूप में वर्तमान है। इसमें जड़-प्रकृति में “रचना-क्रम में विकास” का क्रम, और “परमाणु में विकास-क्रम” पूर्वक गठन-पूर्णता के स्वरूप में विकसित होना स्पष्ट हुआ। गठन-पूर्ण परमाणु ही “जीवन” है। जीवन-महिमा के रूप में आशा, विचार, इच्छा, ऋतंभरा, और प्रमाणों (अर्थात अनुभव-प्रमाणों) के रूप में अध्ययन करने की विधि स्पष्ट हुई।
“सच्चाई” अपने स्वरूप में सह-अस्तित्व ही है। सह-अस्तित्व में अनुभव होना ही “ज्ञान” है। “ज्ञेय” सह-अस्तित्व ही है। “ज्ञाता” जीवन है। इस प्रकार ज्ञाता, ज्ञान, और ज्ञेय तीनो स्पष्ट होता है। इस मुद्दे पर विगत में ज्ञान-वादी या ब्रह्म-वादी परम्परा में “अनुभव” शब्द का प्रयोग किया गया है। इस परम्परा में कहा गया है – “समाधि में अनुभव होता है।”
अनुभव करने वाली वस्तु के बारे में कौन अनुभव करेगा? – यह बात विगत के अनुसार स्पष्ट नहीं रहा। विगत में “जीव” और “आत्मा” की बात की गयी है। जीव के ह्रदय में ब्रह्म स्वयं आत्मा के स्वरूप में बैठा है – ऐसा कहा गया है। इस विधि से जीव अध्ययन करता है, या आत्मा अध्ययन करता है? – यह प्रश्न बनता ही है। इस विधि से आत्मा के अध्ययन करने की बात युक्ति-संगत या तर्क-संगत हो नहीं पाती – क्योंकि आत्मा को “अज्ञानी” कहना बनता नहीं है। जीव माया का स्वरूप है – और माया का अध्ययन करने की तमीज से संपन्न होना सम्भव नहीं है। ऐसा तर्क हो जाता है। अब इस स्थिति में जीव और आत्मा के संयुक्त रूप में अध्ययन होने की चर्चा हो सकता है। शरीर को इस विधि में पञ्च-भूतों का संयुक्त स्वरूप बता चुके हैं। पञ्च-भूतों का भी अध्ययन जैसी चीज के लिए साधन होना तर्क-संगत नहीं लगता। इस लिए आदर्शवादी विधि से मानव में, मानव से, मानव के लिए अध्ययन की संभावना पर विश्वास करना बनता नहीं है। आदर्शवादी विधि से – मनुष्य को सच्चाई का अध्ययन करने का अधिकार नहीं है। आदर्शवादी विधि से – सच्चाई को अध्ययन करने योग्य स्थिति-परिस्थिति मनुष्य के साथ जुड़ा नहीं है। इसी क्रम में शास्त्रों में मनुष्य को “अल्पज्ञ” कहा है – संभवतः इसी संकट से कहा हो!
इस प्रकार आदर्शवादी विधि से मानव-परम्परा के अथक प्रयासों के बाद भी अभी तक मानव सच्चाई को अध्ययन करने में असमर्थ रहा है।
आदर्शवाद के बाद जो भौतिकवाद प्रभावित हुआ, वह सर्व-मानव में स्वीकार हुआ। लेकिन उसके बावजूद भौतिकवाद का सच्चाई से कोई लेन-देन नहीं रहा। दोनों विचारधाराओं के सच्चाई का अध्ययन न करा पाने से मानव-परम्परा सच्चाई से वंचित रहा।
इसी के साथ यह भी सर्वेक्षण में आता है – आदर्शवाद ने शब्द, शास्त्र, और आप्त-वाक्यों को “प्रमाण” माना है, लेकिन मानव को “प्रमाण” का आधार नहीं माना। “आप्त-पुरूष” मानव से अतिदूर वाला वस्तु हो गयी। इस प्रकार कुछ और भ्रम-जाल ही मानव-परम्परा को हाथ लगा।
मानव अपने यथा-स्थिति में, अर्थात भ्रमित अवस्था में, अथवा जीव-चेतना में जीते हुए स्थिति में भी “सच्चाई” का प्यासा है। इस तथ्य का परीक्षण करने के लिए हम संवाद विधि से लोगों के साथ संभाषण कर सकते हैं। संभाषण करने में पूछने पर – “सच्चाई चाहिए या झूठ?”, इसके उत्तर में सच्चाई के पक्ष में ९९% लोगों की सहमति है। सच्चाई के “प्रमाण” के बारे में जब पूछा जाता है तो इसके उत्तर में कुछ प्रतिशत लोग कहते हैं – “सच्चाई मनुष्य-परम्परा में अध्ययन विधि से स्पष्ट नहीं हुआ।” अत्यल्प प्रतिशत लोग यह कहते हैं – “जीने के लिए सच्चाई आवश्यक नहीं है।” ऐसे सर्वेक्षण से पता चलता है – मनुष्य-परम्परा में सच्चाई अध्ययन-सुलभ नहीं हुआ। इसी रिक्तता वश विकल्पात्मक विधि से यह सच्चाई के अध्ययन का प्रस्ताव प्रस्तुत है।
- श्रद्धेय बाबा श्री नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००६, अमरकंटक)
at 11/21/2009
साभार- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)