सुख
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“मानव सुखी होना चाहता है। सुख के स्वरूप ज्ञान के लिए मैंने प्रयत्न किया। मानव का अध्ययन न हो और सुख पहचान में आ जाए – ऐसा हो नहीं सकता। दूसरे, मानव का अध्ययन करने का आधार सुखी होने के अर्थ में है, और कोई अर्थ में नहीं है।”
- श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अगस्त 2006, अमरकंटक)
साभार:
जो बात “सहज-स्वीकृत” है, “सर्व-स्वीकृत” है, “स्थल-काल के बंधन से मुक्त” है, ऐसी बात कल्पना नहीं परंतु वास्तविकता होती है.”मैं निरंतर सुखपूर्वक जीना चाहता हूँ.” इस बात को उपर बताए मापदंडों से जांच के हम तय कर सकते है की, निरंतर सुखपूर्वक जीना कोई कल्पना है या अस्तित्वसहज वास्तविकता है. सदुपयोग ही सुख है और दुरुपयोग ही दुख है.सुख समान कोई पुरस्कार नहीं, और दुख समान कोई दंड नहीं. सर्वशुभ-सर्वसुख की मानसिकतापूर्वक जीना ही सह-अस्तित्वपूर्वक जीने का मतलब है.
व्यक्तिवादी-समुदायवादी विधि से जीता हुआ प्रत्येक मानव समस्याओं को पालता है, पोषता है और वितरित करता है,
जबकि
परिवार-मानव विधि से जीता हुआ प्रत्येक मानव समाधान को पालता है, पोषता है और वितरित करता है, क्योंकि जो जिसके पास रहता है वह उसीका आबंटन करता है।