प्रश्न: उपदेश “माने हुए को जान लो, जाने हुए को मान लो” में जानना-मानना से क्या आशय है?

जानना अनुभव है. मानना संकल्प है। जानना पूरा ही होता है. जीने में प्रमाणित होने के लिए “मानना” या संकल्प है। सार्वभौम व्यवस्था में तदाकार-तद्रूप होने पर जानना-मानना हुआ। सार्वभौम-व्यवस्था ही प्रयोजन है। इसके लिए अपनी कल्पनाशीलता को लगाना ही पड़ता है। सम्पूर्ण व्यवस्था में तदाकार-तद्रूप होने के बाद, हर सम्बन्ध को व्यवस्था के अर्थ में पहचानने के बाद मानव स्व-तंत्र हो जाता है।
अध्ययन अस्तित्व की यथार्थता, वास्तविकता, और सत्यता को “जानने” की विधि है। “जानने” के बाद “मानना” होता ही है। अध्ययन विधि में “मानने” से शुरू करते हैं। “ मानने” के बाद “जानना” आवश्यक हो जाता है। “ मानने” से यथार्थता, वास्तविकता, और सत्यता का भास-आभास होता है। फिर उसको अनुभव करने के लिए प्राथमिकता यदि बन जाता है तो प्रतीति होता ही है। प्रतीति होता है तो अनुभूति होता ही है। प्रतीति के बाद अनुभूति के लिए कोई पुरुषार्थ नहीं है, वह अपने-आप से होता है। प्रतीति तक पुरुषार्थ है, अर्थात श्रम पूर्वक प्रयास है, तर्क का कुछ दूरी तक प्रयोग है। अनुभूति परमार्थ है. फल-स्वरूप मानव परमार्थ विधि से सोचना, कार्य करना शुरू कर देता है।
“मानने” पर “जानना” बनता है। “ नहीं मानने” पर “जानना” बनता नहीं है। जीने में प्रमाण को “माने” बिना जानना बनता नहीं है। “ नहीं मानना” भी एक व्याधा है – जिसको आप परीक्षण कर सकते हैं। आपके पास “मानने” वाला गुण है। उस गुण के प्रयोग से आप एक खाके के बाद दूसरा खाका को समझ सकते हो। “ मानने” के बाद “जानने” की बारी आती है। मानने की बात जिज्ञासा के साथ आगे के projection में रखना होता है, तभी जानने वाली बात पूरा हो पाती है। तभी व्यक्ति से व्यक्ति का प्रतिरूप होना बन जाता है। “ सह-अस्तित्व का प्रतिरूप” हो गया तो सारा संकट समाप्त हो गया।
अनुभव के पहले प्रमाण नहीं है, अनुभव के पहले कल्पनाशीलता की सीमा में ही है। अनुभव-योग्य वस्तु ही अनुभव होता है। अनुभव-योग्य नहीं हुए, तभी अनुभव नहीं हुआ। अनुभव करने की क्षमता, बोध करने की क्षमता, चिंतन करने की क्षमता जीवन में बनी हुई है। इनको हमे “बनाना” नहीं है. अनुभव करने के योग्य होने के लिए, बोध करने योग्य होने के लिए, चितन करने योग्य होने के लिए अध्ययन है। यह वैसा ही है, जैसे बैटरी को चार्ज करते हैं तभी बैटरी काम करता है।
सत्ता की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता, इसीलिये सत्ता को “स्थिति-पूर्ण” कहा है। प्रकृति में स्थिति के साथ गति है, इसीलिये प्रकृति को “स्थिति-शील” कहा है। प्रकृति में पूर्णता के अर्थ में प्रगटन-क्रम है। पूर्णता के चरण हैं – गठन-पूर्णता, क्रिया-पूर्णता, आचरण-पूर्णता।
मानव जब तक जागृति-क्रम में है तब तक भ्रमित है। मानव जागृति-क्रम में होने से कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोग किया है। इसमें से कर्म-स्वतंत्रता को प्रमाणित किया है। किन्तु कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिंदु मिला नहीं है। मनः स्वस्थता कल्पनाशीलता का तृप्ति-बिंदु है। मानव का ‘होना’ नियति-विधि से है। मानव का ‘रहना’ जागृति-विधि से है।
मानव-लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व) और जीवन-लक्ष्य (सुख, शान्ति, संतोष, आनंद) को कोई नकार नहीं पाता है। यही इस प्रस्ताव की “अचूक” बात है. –
बाबा श्री ए. नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अक्टूबर २०१०, अमरकंटक)