विचार का मूल रूप
➡️प्रश्न: विचार का मूल रूप क्या है?
उत्तर: विचार का मूल रूप है – तुलन। तुलन ही गति रूप में है – विश्लेषण। वही विचार है। तुलन के बिना आदमी एक कदम आगे नहीं रख सकता। जैसे – प्रिय-तुलन के अर्थ में ठीक लगना, हित-तुलन (शरीर स्वस्थता ) के अर्थ में ठीक लगना, लाभ के अर्थ में ठीक लगना। फ़िर उसी के अनुसार विश्लेषण हो जाता है। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता के तृप्ति बिन्दु मिलने के प्रयोजन से ही मनुष्य विश्लेषण करता है। मनुष्य के सुख की मूल चाहना के लिए तुलन करना बहुत आवश्यक है। सुख की मूल चाहना के प्रमाणित होने में न्याय-धर्म-सत्य पूर्वक तुलन होता है, यह मध्यस्थ दर्शन का प्रतिपादन है।
➡️प्रश्न: क्या भाषा के साथ ही विचार होता है?
विचार जीवन में है ही। शब्द/भाषा मानव-परम्परा में विचारों की संप्रेषणा के लिए माध्यम है। भाषा के मूल में “भाव” होता है। मध्यस्थ-दर्शन ने “भाव” के मूल में जीवन-क्रियाओं को पहचाना। आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, और अनुभव – ये भाव भाषा द्वारा संप्रेषित होते हैं। शब्द द्वारा संप्रेषणा का प्रयोजन है – दूसरे व्यक्ति को किसी क्रिया, प्रयोजन, वस्तु, घटना का बोध कराना।
आदर्शवादियों ने “भाव” को पाँच संवेदनाओं की सीमा में ही पहचाना। ज्ञान ही “पूर्ण भाव” है – ऐसा बताया। भक्ति-वादियों ने जिस देवी-देवता को मानते हैं, उसका स्वरूप ही “पूर्ण भाव” है – यह बता दिया। वह सब रहस्य हो गया – प्रमाण नहीं हुआ।
भौतिकवादी “भाव” को नहीं मानते। जो बात यांत्रिक विधि से प्रमाणित नहीं होता उसको वे मन-गढ़ंत बताते हैं।
मध्यस्थ-दर्शन के अनुसार जीवन की १० क्रियाएं (स्थिति में ५, और गति में ५) ही भाव हैं। इन्ही भाव में ही सभी मूल्य निहित हैं। मानव परम्परा में जीवन की १० क्रियाएं ही मौलिक रूप में व्यक्त होने की वस्तु है।
- श्रद्धेय बाबा जी श्री ए नागराज जी के साथ संवाद पर आधारित (अप्रैल २००८, अमरकंटक)
साभार- madhyasth-darshan