विकल्पात्मक अनुसन्धान से प्राप्त ज्ञान का शिक्षा में समावेश – भाग-१
मेरे बंधुओं!
मैं स्वयं को आप सभी के बीच पा करके सुख का अनुभव कर रहा हूँ। बहुत दूर-दूर से आप आए हैं। बहुत ध्यान लगा कर एक दूसरे की बात समझ रहे हैं। कहीं न कहीं अन्तिम निष्कर्ष निकलेगा ही, ऐसा विश्वास करके मैं उत्सवित हूँ।
विकल्पात्मक अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान शिक्षा में किस प्रकार पहुंचेगा? – उसको सुनने के लिए यहाँ इच्छा व्यक्त किया गया है। आप सब बहुत जिज्ञासा से इस बात को सुनना चाह रहे हैं, ऐसा मेरा स्वीकृति है।
मैं इस बात को बहुत अच्छी तरह से परखा हूँ, किसी आयु के बाद हर व्यक्ति – चाहे नर हो या नारी हो – अपने आप को “समझदार” मानता ही है। अभी तक की सोच से कुछ ऐसा निकलता है – “पैसा पैदा कर सकने वाला समझदार है। पैसा पैदा नहीं कर सकने वाला समझदार नहीं है।” इसके पहले “बलशाली” को समझदार मानते रहे। उसके पहले “रूपवान” को समझदार मानते रहे। “बल” और “रूप” के आधार पर समझदारी को पहचानने की कोशिशों को आदमी नकार चुका है। लेकिन ज्यादा “धन”और “पद” अर्जन करने वाले को ज्यादा समझदार आज भी मानते रहे हैं। “धन” और “पद” एक दूसरे के पूरक हो गए। पद से धन, और धन से पद मिलने की बात हो गयी। रूप, बल, पद, और धन के आधार पर हम समझदारी को पहचान नहीं पायेंगे। यह हमारा निष्कर्ष निकला। मानव-चेतना पूर्वक जीना समझदारी है – यह निष्कर्ष निकला।
मानव-चेतना को मानव-परम्परा में लाने के लिए मैंने शिक्षा विधि को शोध किया। शिक्षाविदों को समझाने का कोशिश किया। वह कोशिश होते-होते आज छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा संस्थान इस प्रस्ताव को अध्ययन करने के लिए तैयार हो गया। वह बुद्धि, समय, और साधन लगा कर अध्ययन कर रहा है। यह आपको सूचना देना चाहा।
इस अध्ययन की क्या वस्तु है?
इस अनुसंधान के फलस्वरूप “मानव व्यवहार दर्शन” नामक पुस्तिका तैयार हुआ – जिसको “शोध-ग्रन्थ” भी कह सकते हैं। मानव-व्यवहार-दर्शन में मानव-चेतना विधि से व्यवहार का क्या स्वरूप होता है? न्याय का क्या स्वरूप होता है? इसका वर्णन है। उसको अध्ययन कराते हैं। “मानव व्यवहार दर्शन” में मानव के कर्तव्य और दायित्व को तय किया। मानव का कर्तव्य और दायित्व तय होना ज़रूरी है या नहीं है – इस पर आप ही निर्णय लीजिये। यह निर्णय लेना हर व्यक्ति का अधिकार है।
“मानव कर्म दर्शन” में मानव के करने-योग्य और न करने-योग्य कर्मो का विभाजन होता है। इसकी भी आवश्यकता या अनावश्यकता पर आप अच्छे से विचार कर सकते हैं। यदि यह हमारी आवश्यकता बनता है तो उसके लिए हम तत्पर हो ही जाते हैं। जिसकी आवश्यकता हम स्वीकार नहीं करते, उसके लिए हम तत्पर नहीं हो पाते हैं।
“मानव अभ्यास दर्शन” में व्यवहार और व्यवसाय में अभ्यास कैसे करेंगे – इसका निर्धारण किया गया है।
“अनुभव दर्शन” में प्रमाणित होने के अधिकार को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया गया है।
इन चारों भागों की आवश्यकता है या नहीं है – इसको सभी परिशीलन (निरीक्षण, परीक्षण) कर सकते हैं, समझ सकते हैं, प्रमाणित कर सकते हैं।
- बाबा जी श्री नागराज जी शर्मा के उदबोधन पर आधारित (२ अक्टूबर २००९, हैदराबाद)
साभार- मध्यस्थ दर्शन ब्लॉग (जीवन विद्या – सह अस्तित्व में अध्ययन)